31 October 2026

11571 - 11575 दुश्मन पछता मंज़िल ज़हान मोहब्बत ज़हाँ ज़ुदा शामिल अलग़ पहचान अंदाज़ शायरी

11571
अंदाज़ मुझसे और हैं,
दुश्मनसे और ढंग़…
पहचान मुझक़ो अपनी,
पराई क़ज़ाक़ी हैं……
                                बेख़ुद देहलवी

11572
सुधर गये तो,
तुमही बहुत पछताओग़े l
ये शायराना अंदाज़ही,
तो मेरी पहचान हैं ll

11573
मंज़िलें ग़र्दक़े मानिंद उड़ी ज़ाती हैं…
l
वहीं अंदाज़-ए-ज़हान-ए-ग़ुज़राँ हैं क़ि ज़ो था…ll
                                                                           फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी

11574
क़भी तू नाराज़ क़भी मैं नाराज़,
उफ्फ ये मोहब्बत उफ्फ ये अंदाज़…

11575
मेरा अंदाज़ 'नसीर',
अहल-ए-ज़हाँसे हैं ज़ुदा...
सब में शामिल हूँ,
मग़र सबसे अलग़ बैठा हूँ ...ll
                                                 पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर ग़ीलानी

No comments:

Post a Comment