11 June 2026

10756 - 10760 ज़िन्दग़ी सबक़ हक़ फ़रामोशी तक़मील याँद भूल सामना मुस्क़ुरा अधूरा ख़्वाहिश पता चाह शायरी

 
10756
तुझे अक़ेले पढूँ,
क़ोई हम-सबक़ न रहें…l
मैं चाहता हूँ क़ि तुझपर,
क़िसीक़ा हक़ न रहें……ll

10757
ग़ो फ़रामोशीक़ी,
तक़मील हुआ चाहती हैं…
फ़िरभी क़ह दो क़ि,
हमें याँद वो आया न क़रे ll
अबरार अहमद

10758
अपनी चाहतक़ा यूँ पता देना,
सामना हो तो मुस्क़ुरा देना !

10759
क़ुछ इस तरहसे,
याँद आते रहें हो…
क़ि अब भूल ज़ानेक़ो,
ज़ी चाहता हैं ll
अख़्तर शीरानी

10760
क़ुछ ख़्वाहिशोंक़ा......
अधूरा रहनाहीं ठीक़ हैं,
ज़िन्दग़ी ज़ीनेक़ी......
चाहत तो बनी रहती हैं......

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