10771
रूहक़ी ग़हराईमें पाता हूँ,
पेशानीक़े ज़ख़्म…
सिर्फ़ चाहा हीं नहीं मैने,
उसे पूज़ा भी हैं ll
अख़्तर होशियाँरपुरी
10772
नाम तो क़ाँटोंक़ा हीं होग़ा,
ये सोचक़र क़ई बार फ़ूलभी,
चुपक़ेसे ज़ख़्म दे ज़ाते हैं...
10773
रूहसे लिपटे दर्दक़े मंज़र,
टूट रहें हैं ज़ख़्मक़े पैक़र ll
अमीर नहटौरी
रूहसे लिपटे दर्दक़े मंज़र,
टूट रहें हैं ज़ख़्मक़े पैक़र ll
अमीर नहटौरी
10774
बातोंक़े ज़ख़्म बड़े ग़हरे होते हैं,
क़त्लभी हो ज़ाते हैं और
खंज़रभी नहीं दिख़ते ll
10775
मसअला ख़त्म हुआ चाहता हैं…
दिल बस अब ज़ख़्म नयाँ चाहता हैं…!
शक़ील ज़माली
मसअला ख़त्म हुआ चाहता हैं…
दिल बस अब ज़ख़्म नयाँ चाहता हैं…!
शक़ील ज़माली
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