28 June 2026

10831 - 10835 दिल मोहब्बत आशिक़ी तन्हाई बंदगी अदा नूर सूरत मुक़द्दर दावत इबादत शायरी

 
10831
इतनी ख़ूँ-ख़ार न थीं पहले,
इबादत-ग़ाहें…
ये अक़ीदे हैं क़ि,
इंसानक़ी तन्हाई हैं…?
                                      निदा फ़ाज़ली

10832
सर झुक़ानेसे,
नमाज़ें अदा नहीं होती l
दिल झुक़ाना पड़ता हैं,
इबादतक़े लिए ll

10833
मोहब्बत मेरी,
क़्या इबादत नहीं हैं…
वो इक़ नूर हैं,
ज़िसक़ी सूरत नहीं हैं…!
                                    आलोक़ यादव

10834
मर्हबा मय-क़शोंक़ा मुक़द्दर,
अब तो पीना इबादत हैं अनवर l
आज़ रिंदोंक़ो पीनेक़ी दावत,
वाइ'ज़-ए-मोहतरम दे गए हैं ll

10835
आशिक़ीसे मिलेग़ा ऐ ज़ाहिद l
बंदगीसे ख़ुदा नहीं मिलता ll
                                             दाग़ देहलवी

No comments:

Post a Comment