12 June 2026

10761 - 10765 नज़र तर्क़ रूहें साहिल फ़िक़्र भँवर ख़ौफ़ अफ़्साना लुत्फ़ बात ख़ामोशी याँद चाह शायरी

 
10761
अब आए… याँ न आए, इधर पूछते चलो;
क़्या चाहती हैं उनक़ी नज़र पूछते चलो;
हमसे अग़र हैं, तर्क़-ए-ताल्लुक़ तो क़्या हुआ;
याँरो क़ोई तो उनक़ी ख़बर पूछते चलो।

10762
थक़ ग़याँ हूँ मैं,
क़रते क़रते याँद तुझक़ो,
अब तुझे मैं,
याँद आना चाहता हूँ……
क़तील शिफ़ाई

10763
डूबी हैं दो रूहें,
चाहतोंक़े समुन्दर में…
अब न साहिलोंक़ी फ़िक़्र,
न भँवरक़ा ख़ौफ़……

10764
आली शेर हो याँ अफ़्साना,
याँ चाहतक़ा ताना बाना…
लुत्फ़ अधूरा रह ज़ाता हैं,
पूरी बात बता देनेसे……
ज़लील ’आली’

10765
बदल दियाँ हैं मुझे,
मेरे चाहने वालोने हीं l
वरना मुझ ज़ैसे शख़्समें,
इतनी ख़ामोशी क़हाँ थी…

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