11001
उसे पाक़ नज़रोंसे चूमनाभी,
इबादतों में शुमार हैं…l
क़ोई फ़ूल लाख़ क़रीब हो क़भी,
मैने उसक़ो छुआ नहीं……!
बशीर बद्र
11002
ज़वाँ होने लग़े ज़ब वो,
तो हमसे क़र लिया पर्दा…
हया यक़-लख़्त आयी,
और शबाब आहिस्ता आहिस्ता……!
11003
दुनियाँ क़हे क़ुछ हैं,
मगर ईमानक़ी ये बात…
होनेक़ी तरह हो तो,
इबादत हैं मोहब्बत…!
मंज़र लख़नवी
दुनियाँ क़हे क़ुछ हैं,
मगर ईमानक़ी ये बात…
होनेक़ी तरह हो तो,
इबादत हैं मोहब्बत…!
मंज़र लख़नवी
11004
अब इश्क़
नहीं,
इबादतक़ी
ज़ाएगी,
तुमसे जुड़ी
हर बात,
हिफ़ाज़तसे
रख़ी ज़ाएगी।
11005
दुनिया मिरे
सज़्देक़ो,
इबादत न समझना…
पेशानीपें क़िस्मतक़ा लिखा,
क़ाट रहा हूँ ll
मुनव्वर राना
इबादत न समझना…
पेशानीपें क़िस्मतक़ा लिखा,
क़ाट रहा हूँ ll
मुनव्वर राना
No comments:
Post a Comment