11296
क़्या लिख़ूँ,
अपनी ज़िंदग़ीक़े बारेमें…
वो लोग़ हीं बिछड़ ग़ए,
ज़ो ज़िंदग़ी हुआ क़रते थे......
11297
मुद्दतें हो ग़ईं,
बिछड़े हुए तुमसे लेक़िन…
आज़ तक़ दिलसे मिरे,
याँद तुम्हारी न ग़ई……
अख़्तर शीरानी
11298
ज़ो वो मिरे न रहें,
मैं भी क़ब क़िसीक़ा रहा…
बिछड़क़े उनसे,
सलीक़ा न ज़िंदग़ीक़ा रहा……
ज़ो वो मिरे न रहें,
मैं भी क़ब क़िसीक़ा रहा…
बिछड़क़े उनसे,
सलीक़ा न ज़िंदग़ीक़ा रहा……
11299
तुझसे बिछड़ना,
क़ोई नया हादसा नहीं…
ऐसे हज़ारों क़िस्से,
हमारी ख़बरमें हैं……
आशुफ़्ता चंग़ेज़ी
11300
शाम आई तो बिछड़े हुए हमसफ़र,
आँसुओंसे इन आँख़ोंमें आने लग़े,
आँख़ें मंज़र हुई, क़ाम नग़्मा हुए,
घरक़े अंदाज़ हीं घरसे ज़ाते रहें।
शाम आई तो बिछड़े हुए हमसफ़र,
आँसुओंसे इन आँख़ोंमें आने लग़े,
आँख़ें मंज़र हुई, क़ाम नग़्मा हुए,
घरक़े अंदाज़ हीं घरसे ज़ाते रहें।