19 April 2026

10686 - 10690 इश्क़ सफ़र तमन्ना मंज़ूर ज़िग़र याँद ग़म उम्र शिक़ार सोज़िश लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म शायरी

 
10686
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-तमन्नासे,
हूँ सरग़र्म-ए-सफ़र,
वर्ना क़ब मंज़ूर थी,
ये ज़ादा-पैमाई मुझे ll
                              एहसान नानपर्वी

10687
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र,
तल्ख़ी-ए-सहबा-ए-ज़ुनूँ…
अब क़ोई चीज़,
तिरे ग़मक़े सिवा याँद नहीं…!
इशरत ज़ालंधरी

10688

इक़ उम्र चाहिए क़ि,
ग़वारा हो नीश-ए-इश्क़…
रक्ख़ी हैं आज़,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र क़हाँ…
                                             अल्ताफ़ हुसैन हाली

10689
देग़ी न चैन लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म,
उस शिक़ारक़ो
ज़ो ख़ाक़े तेरे हाथक़ी,
तलवार ज़ाएग़ा…
मीर तक़ी मीर

10690 

मिज़्ग़ाँ हरीफ़-ए-क़ाविश-ए-नाख़ुन,
न हो सक़ीं …
सोज़िश तो हैं पे,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र नहीं…
                                               अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद

18 April 2026

10681 - 10685 इश्क़ तौहीन नासूर तस्क़ीन दुनियाँ सिलसिला ज़िग़र उम्र ग़वारा शिक़वा लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म शायरी


10681
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्मसे,
तस्क़ीन हुआ क़रती हैं l
इश्क़में क़ौनसी तौहीन,
हुआ क़रती हैं ll
                                  मसऊद अहमद

10682
हमदमो क़ैसे बताएँ,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-दरूँ…
बन ग़या नासूर वो,
ज़ो ज़ख़्म अच्छा हो ग़या ll
इशरत सफ़ी पुरी

10683
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्मसे,
आग़ाह नहीं थी दुनियाँ l
सिलसिला ग़ुलसे चला हैं,
ज़िग़र-अफ़ग़ारीक़ा ll
                                     मानी नाग़पुरी

10684
इक़ उम्र चाहिए कि,
ग़वारा हो नीश-ए-इश्क़...
रक्खी हैं आज़,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र क़हाँ…
अल्ताफ़ हुसैन हाली

10685
न हरग़िज़ शिक़वा-ए-बेग़ानग़ी,
क़रता ज़मानेसे…
ज़ो होता,
आश्ना-ए-लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-शनासाई ll
                                                                 अतहर ज़ियाई

17 April 2026

10676 - 10680 मुक़द्दर साथ हसरत नज़ारा बाँसुरी ऊँग़लि दहन सीना शोला पहलू दीद दिल ज़ख़्म शायरी

 
10676
ज़ख़्म ही तेरा मुक़द्दर हैं,
दिल तुझक़ो क़ौन सँभालेग़ा…
मेरे बचपनक़े साथी,
मेरे साथ ही मर ज़ाना……

                                                     ज़ेब ग़ौरी

10677
ज़ो तेरी दीदने,
बख़्शे वहीं हैं ज़ख़्म बहुत
अब अपने दिलमें,
क़ोई हसरत-ए-नज़ारा नहीं
क़तील शिफ़ाई

10678
आ रख़ दहन-ए-ज़ख़्मपें,
फ़िर ऊँग़लियाँ अपनी…
दिल बाँसुरी तेरी हैं,
बज़ानेक़े लिए आ ll

                              क़लीम आज़िज़

10679
दिलसे उठते हुए शोलोंक़ो,
क़हाँ ले ज़ाएँ…
अपने हर ज़ख़्मक़ो,
पहलूमें छुपानेवाले……!
अख़्तर सईद ख़ान

10680
ज़ख़्मने दाद न दी,
तंग़ी-ए-दिलक़ी, याँ रब…
तीर भी सीना-ए-बिस्मिलसे,
पर-अफ़्शाँ निक़ला……

                                         मिर्ज़ा ग़ालिब

9 April 2026

10671 - 10675 फ़ुर्सत फ़िराक़ लज़्ज़त मेहरबान हयात तसव्वुर निहाँ नश्तर ज़िग़र इंतिज़ार चाँद ख़्वाब चेहरा अश्क़ ज़ख़्म शायरी

 
10671
क़िस फ़ुर्सत-ए-विसालपें हैं,
ग़ुलक़ो अंदलीब…
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़,
ख़ंदा-ए-बे-ज़ा क़हें ज़िसे……
                                               मिर्ज़ा ग़ालिब

10672
ज़ब तिरे शहरसे ग़ुज़रता हूँ…
लज़्ज़त-ए-वस्ल हो क़ि,
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़ l
ज़ो भी हो तेरी मेहरबानी हैं ll
सैफ़ुद्दीन सैफ़

10673

नए तसव्वुरोंक़ा क़र्ब,
अल-अमाँ क़ि हयात…
तमाम ज़ख़्म निहाँ हैं,
तमाम नश्तर हैं……!
                                फ़िराक़ गोरख़पुरी

10674
शब-ए-फ़िराक़ ज़ो ख़ोले हैं,
हमने ज़ख़्म-ए-ज़िग़र…
ये इंतिज़ार हैं,
क़ब चाँदनी निक़लती हैं…?
दाग़ देहलवी

10675

ज़ब ख़्वाब हुईं उसक़ी आँखें,
ज़ब धुँद हुआ उसक़ा चेहरा…
हर अश्क़ सितारा उस शब था,
हर ज़ख़्म अंग़ारा उस दिन था……
                                                    अहमद फ़राज़

8 April 2026

10666 - 10670 दिल ज़िंदगी निख़र हिज़्र ख़ौफ़ पत्थर भेद समझ आँखें नसीब ख़ून ख़ुशी ज़ख़्म शायरी


10666
बहुत अज़ीज़ हैं दिलक़ो,
ये ज़ख़्म ज़ख़्म रुतें…
इन्ही रुतोंमें निख़रती हैं,
तेरे हिज़्रक़ी शाम……
                               मोहसिन नक़वी

10667
मैं चाहता हूँ क़ि,
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हो ज़ाऊँ…
और इस तरह क़ि,
क़भी ख़ौफ़-ए-इंदिमाल न हो ll
ज़व्वाद शैख़

10668
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हुआ,
ज़ब तो मुझपें भेद ख़ुला…
क़ि पत्थरोंक़ो समझती रहीं,
ग़ुहर आँखें……
                                         मोहसिन नक़वी

10669 
मिरे दिलमें ज़ख़्म ही ज़ख़्म हैं,
मुझे ताब-ए-ज़ब्त रही नहीं...
मैं अलम-नसीब हूँ,
आज-कल मिरी ज़िंदगीमें ख़ुशी नहीं ll
अज़ीज़ क़ादरी

10670
ज़ख़्म-हा-ज़ख़्म हूँ,
और क़ोई नहीं ख़ूँ क़ा निशाँ…
क़ौन हैं वो ज़ो मिरे ख़ूनमें,
तर हैं मुझमें……
                                            ज़ौन एलियाँ

7 April 2026

10661 - 10665 फ़ूल निशान रफ़्ता हाल भूल सनम वक़्त ग़म लौट ज़ख़्म शायरी

 
10661
उसक़ा ज़ो हाल हैं,
वही ज़ाने l
अपना तो ज़ख़्म,
भर ग़याँ क़बक़ा ll
                     ज़ावेद अख़्तर

10662
अग़ले वक़्तोंक़े,
ज़ख़्म भरने लग़े...
आज़ फ़िर क़ोई,
भूल क़ी ज़ाए......
                         राहत इंदौरी

10663
रफ़्ता रफ़्ता हर इक़,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
सब निशानात,
फ़ूलोंसे ढक़ ज़ाएँग़े...!
                                  बशीर बद्र

10664
'फ़ाक़िर' सनम-क़देमें,
न आता मैं लौटक़र...
इक़ ज़ख़्म भर ग़याँ था,
इधर लेक़े आ ग़याँ......
                                सुदर्शन फ़ाक़िर

10665
ग़म न क़र, ग़म न क़र,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
ग़म न क़र, ग़म न क़र...
                                  फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

6 April 2026

10656 - 10660 दिल हाथ धोक़ा चालाक़ बयाज़ लग़ा रसाई दुश्मन आज़मा ज़ख़्म शायरी


10656
ज़ख़्म लग़ाक़र उसक़ा भी,
क़ुछ हाथ ख़ुला l
मैं भी धोक़ा ख़ाक़र,
क़ुछ चालाक़ हुआ…
                                          ज़ेब ग़ौरी

10657
यूँ ही इक़ ज़ख़्मपर,
दे दी थी इस्लाह…
सो अब लेक़र,
बयाज़ आने लग़ा हैं
फ़रहत एहसास

10658
इस बार हूँ दुश्मनक़ी,
रसाईसे बहुत दूर…
इस बार मग़र,
ज़ख़्म लग़ाएग़ा क़ोई और…
                                        आनिस मुईन

10659
क़्या क़रे मेरी,
मसीहाईभी क़रनेवाला
ज़ख़्म ही ये मुझे,
लग़ता नहीं भरनेवाला…
परवीन शाक़िर

10660
हाथ ही तेग़-आज़माक़ा,
क़ामसे ज़ाता रहा…
दिलपें इक़ लग़ने न पायाँ,
ज़ख़्म-ए-क़ारी हाए हाए…
                                       मिर्ज़ा ग़ालिब

5 April 2026

10651 - 10655 दिलासे ग़हरा रूह सोच याँद दरियाँ ग़हराई फ़ुर्सत उदास क़सक़ दिल आँख़ ज़ख़्म शायरी

 
10651
लोग़ देते रहें,
क़्या क़्या न दिलासे मुझक़ो
ज़ख़्म ग़हरा ही सही,
ज़ख़्म हैं भर ज़ाएग़ा……
                                        शक़ेब ज़लाली

10652
आपक़ी आँख़से ग़हरा हैं,
मिरी रूहक़ा ज़ख़्म…
आप क़्या सोच सकेंग़े,
मिरी क़ो
मोहसिन नक़वी

10653
ये मसीहाई,
उसे भूल ग़ई हैं 'मोहसिन'
याँ फ़िर ऐसा हैं,
मिरा ज़ख़्म ही ग़हरा होग़ा…
                                         मोहसिन नक़वी

10654
क़िसने देख़ें हैं,
तिरी रूहक़े रिसते हुए ज़ख़्म…
क़ौन उतरा हैं,
तिरे क़ल्ब क़ी ग़हराईमें
रईस अमरोहवी

10655
न अब वो याँदोंक़ा चढ़ता दरियाँ,
न फ़ुर्सतोंक़ी उदास बरख़ा…
यूँही ज़रासी क़सक़ हैं दिलमें,
ज़ो ज़ख़्म ग़हरा था भर ग़याँ वो ll
                                                  नासिर क़ाज़मी

4 April 2026

10646 - 10650 दिल निग़ार-ख़ाने ख़ूबसूरत बिछड़ा जिस्म अबरू ज़ख़्म शायरी

 
10646
देख़ दिलक़े निग़ार-ख़ानेमें,
ज़ख़्म-ए-पिन्हाँक़ी हैं निशानी भी…
फ़िराक़ गोरख़पुरी

10647
अब तो ये आरज़ू हैं क़ि,
वो ज़ख़्म ख़ाइए…
ता-ज़िंदग़ी ये दिल,
न क़ोई आरज़ू क़रे
अहमद फ़राज़

10648
ज़ख़्म आँख़ोंक़े भी सहते थे,
क़भी दिलवाले…
अब तो अबरूक़ा इशारा,
नहीं देख़ा ज़ाता……
                                         मोहसिन नक़वी

10649
बिछड़ा हैं ज़ो इक़ बार,
तो मिलते नहीं देख़ा…
इस ज़ख़्मक़ो हमने,
क़भी सिलते नहीं देख़ा…
परवीन शाक़िर

10650
अभी हम ख़ूबसूरत हैं,
हमारे जिस्म औराक़-ए-ख़िज़ानी हो गए हैं l
और रिदा-ए-ज़ख़्म से आरास्ता हैं ll
फ़िर भी देख़ो तो
हमारी ख़ुश-नुमाईपर कोई हर्फ़,
और कशीदा-कामतीमें ख़म नहीं आया…
अहमद फ़राज़

3 April 2026

10641 - 10645 दिल नज़र अश्क़ चूम दस्त ज़िग़र नींद ख़्वाब वहशत आफ़त ज़ौहर सर देख़ ज़ख़्म शायरी

 

10641
हर एक़ ज़ख़्मक़ो,
अश्क़ोंसे धोक़े चूम लिया;
मैं ऐसे ठीक़ हुआ,
उसक़ी देख़-भालक़े बाद…!
                                              वरुन आनन्द

10642
नज़र लग़े न क़हीं उसक़े,
दस्त-ओ-बाज़ूक़ो…
ये लोग़ क़्यूँ मिरे,
ज़ख़्म-ए-ज़िग़रक़ो देख़ते हैं…?
मिर्ज़ा ग़ालिब

10643
नींद पिछली सदीक़ी ज़ख़्मी हैं;
ख़्वाब अग़ली सदीक़े देख़ते हैं ll
                                                   राहत इंदौरी

10644
वहशत-ए-ज़ख़्म-ए-वफ़ा,
देख़ क़ि सर-ता-सर दिल…
बख़ियाँ जूँ ज़ौहर-ए-तेग़,
आफ़त-ए-ग़ीराई हैं…ll
मिर्ज़ा ग़ालिब

10645
रुत बदलने लग़ी,
रंग़-ए-दिल देख़ना,
रंग़-ए-ग़ुलशनसे अब,
हाल ख़ुलता नहीं l
ज़ख़्म छलक़ा क़ोई,
याँ क़ोई ग़ुल ख़िला…
अश्क़ उमडे क़ि,
अब्र-ए-बहार आ ग़या…
                              फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

2 April 2026

10636 - 10640 दिल मोहब्बत दुश्मन दीवाना उमीद चेहरा निशा नज़र हिज़्र वस्ल दिख़ा ज़ख़्म शायरी

 
10636
क़्या क़्या न उसक़ो,
ज़ोम-ए-मसीहाई था 'उमीद'…
हमने दिख़ाए ज़ख़्म तो,
चेहरा उतर ग़याँ……
                                         उम्मीद फ़ाज़ली

10637
निशान-ए-हिज़्र भी हैं,
वस्लक़ी निशानियोंमें…
क़हाँक़ा ज़ख़्म,
क़हाँपर दिख़ाई देने लग़ा……
शाहीन अब्बास

10638
ये मिरा दिल, मिरा दुश्मन,
मिरा दीवाना दिल…
चाहता हैं क़ि,
सभी ज़ख़्म दिख़ाऊँ उसक़ो......
                                             शहज़ाद अहमद

10639
हिज़्र ऐसा हो क़ि,
चेहरेपें नज़र आ ज़ाए...
ज़ख़्म ऐसा हो क़ि,
दिख़ ज़ाए दिख़ाना न पड़े......
उमैर नज़मी

10340
ये मो'ज़िज़ा भी,
मोहब्बत क़भी दिख़ाए मुझे...
क़ि संग़ तुझपें ग़िरे और,
ज़ख़्म आए मुझे......
                                    क़तील शिफ़ाई

1 April 2026

10631 - 10635 दिल तमन्ना ग़ली नक़्श मेहरबाँ आँखें चाँद सितारा नग़्मा वादा साँस लौ ज़ख़्म शायरी

 
10631
हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना,
पुराने हो ग़ए हैं…
क़ि उस ग़लीमें ग़ए अब,
ज़माने हो ग़ए हैं……
                                    ज़ौन एलिया

10632
हर एक़ नक़्श तमन्नाक़ा,
हो ग़या धुंदला…
हर एक़ ज़ख़्म मिरे दिलक़ा,
भर ग़या याँरो……
शहरयाँर

10633
मेहरबाँ हैं तिरी आँखें,
मग़र ऐ मूनिस-ए-ज़ाँ…
इनसे हर ज़ख़्म-ए-तमन्ना तो,
नहीं भर सक़ता……
                                            अहमद फ़राज़

10634
मैने चाँद और सितारोंक़ी,
तमन्ना क़ी थी…
ज़ख़्म-ए-नग़्मा भी लौ तो देता हैं,
इक़ दियाँ रह ग़याँ ज़लानेक़ो……
अदा ज़ाफ़री

10635
चाक़-ए-वादा न सिले,
ज़ख़्म-ए-तमन्ना न ख़िले…
साँस हमवार रहें,
शम्अक़ी लौ तक़ न हिले…
                                         मुस्तफ़ा ज़ैदी

31 March 2026

10626 - 10630 इलाज़ ग़हरे वक़्त तसव्वुर शिक़ायत भूल ज़राहत क़तरा महताब रात घाव दिल ज़ख़्म शायरी

 

10626
हमने इलाज़-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो,
ढूँड़ लियाँ लेक़िन…
ग़हरे ज़ख़्मोंक़ो भरनेमें,
वक़्त तो लग़ता हैं……
                                                हस्तीमल हस्ती

10627
न वो नशात-ए-तसव्वुर,
क़ि लो तुम आ ही ग़ए…
न ज़ख़्म-ए-दिलक़ी हैं सोज़िश,
क़ोई ज़ो सहनी हो……
ज़ौन एलियाँ

10628
वो फ़िर मोटरसे टक्करक़ी,
शिक़ायत भूल ज़ाएग़ी…
वो ज़ख़्म-ए-दिलक़े आग़े,
हर ज़राहत भूल ज़ाएग़ी……!
                                           ज़रीफ़ ज़बलपूरी

10629
ज़ख़्म-ए-दिलमें नहीं हैं,
क़तरा-ए-ख़ूँ…
ख़ूब हमने दिख़ाक़े,
देख़ लियाँ……
दाग़ देहलवी

10630
ये महताब ये रातक़ी,
पेंशानीक़ा घाव;
ऐसा ज़ख़्म तो दिलपर,
ख़ायाँ ज़ा सक़ता हैं ll
                             अब्बास ताबिश

30 March 2026

10621 - 10625 लुत्फ़ ख़ास तीर क़ब शौक़ रंग़ फ़स्ल दुआ बचपन अल्फ़ाज़ याँद ज़ख़्म शायरी

 
10621
ज़ख़्म दबे तो फ़िर,
नयाँ तीर चला दिया क़रो;
अपना लुत्फ़-ए-ख़ास,
याँद दिला दिया क़रो…ll
                                     पीरज़ादा क़ासिम

10622 
ज़ख़्म उभरते हैं,
ज़ाने क़ब क़बक़े;
ज़ाने क़िस क़िसक़ी,
याँद आती हैं…ll
फ़रहत एहसास

10623
शौक़क़ा रंग़ बुझ ग़याँ,
याँदक़े ज़ख़्म भर ग़ए;
क़्या मिरी फ़स्ल हो चुक़ी,
क़्या मिरे दिन ग़ुज़र ग़ए…?
                                        ज़ौन एलियाँ

10624
दुआएँ याँद क़रा दी ग़ई थीं,
बचपनमें…
सो ज़ख़्म ख़ाते रहें,
और दुआ दिए ग़ए हम…
इफ़्तिख़ार आरिफ़

10625 
क़ाश मैं ऐसी शायरी लिख़ूँ,
तेरी याँदमें,
तेरे दिये ज़ख़्म दिख़ाई दे,
मेरी हर अल्फ़ाज़में  !!!

29 March 2026

10616 - 10620 दिल ज़र्रे तवज्जो शम्स क़मर रात आँख़ अर्सा निशान शरीक़ दर्द ज़ख़्म शायरी

 
10616
ज़र्रेक़े ज़ख़्म दिलपें,
तवज्जोह क़िए बग़ैर...
दरमान-ए-दर्द-ए-शम्स-ओ-क़मर,
क़र रहें हैं हम...

                                                     रईस अमरोहवी


10617
रात छाई तो हर इक़,
दर्दक़े धारे छूटे…
सुब्ह फ़ूटी तो हर इक़,
ज़ख़्मक़े टाँक़े टूटे……
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

10618
क़्यूँ क़िसी औरक़ो,
दुख़ दर्द सुनाऊँ अपने…
अपनी आँख़ोंसे भी,
मैं ज़ख़्म छुपाऊँ अपने……
                                          अनवर मसूद

10619
वो ज़ख़्मभर ग़या, अर्सा हुआ,
मग़र अब तक़…
ज़रासा दर्द, ज़रासा निशान,
बाक़ी हैं……
ज़ावेद अख़्तर

10620
दिलपर ज़ो ज़ख़्म हैं,
वो दिख़ाएँ क़िसीक़ो क़्या…?
अपना शरीक़-ए-दर्द बनाएँ,
क़िसीक़ो क़्या……?
                                          हबीब ज़ालिब

28 March 2026

10611 - 10615 दुनियाँ क़याँमत होश ग़म दर्द अश्क़ दश्त छाले फ़ुग़ाँ तोहफ़े तमन्ना शादाब दाग़ ज़ख़्म शायरी

 
10611
उसक़े बाद अग़ली क़याँमत क़्या हैं,
क़िसक़ो होश हैं…
ज़ख़्म सहलाता था और,
अब दाग़ दिख़लाता हूँ मैं……
                                                   शाहीन अब्बास

10612 
क़भी तो यूँ भी उमँड़ते,
सरिश्क़-ए-ग़म 'मज़रूह';
क़ि मेरे ज़ख़्म-ए-तमन्नाक़े,
दाग़ धो देते…ll
मज़रूह सुल्तानपुरी

10613
क़ुछ ऐसे ज़ख़्म हैं,
ज़िनक़ो सभी शादाब लग़ते हैं l
क़ुछ ऐसे दाग़ हैं,
ज़िनक़ो क़भी धोयाँ नहीं ज़ाता…ll
                                                  आलम ख़ुर्शीद

10614
ज़ख़्म क़ैसे फ़लते हैं,
दाग़ क़ैसे ज़लते हैं,
दर्द क़ैसे होता हैं,
क़ोई क़ैसे रोता हैं
अश्क़ क़्या हैं,
नाले क़्या, दश्त क़्या हैं,
छाले क़्या, आह क़्या, फ़ुग़ाँ क़्या हैं,
तुम न ज़ान पाओग़े……
ज़ावेद अख़्तर

10615
दाग़ दुनियाँने दिए,
ज़ख़्म ज़मानेसे मिले;
हमक़ो तोहफ़े ये,
तुम्हें दोस्त बनानेसे मिले ll
                                        क़ैफ़ भोपाली

27 March 2026

10606 - 10610 दिल हुनर बहार दर्द बिख़र ख़बर रोज़ आसमाँ सुर्ख़ फ़ूल ज़ख़्म शायरी


10606
ज़ख़्मक़ा नाम फ़ूल क़ैसे पड़ा…
तेरे दस्त-ए-हुनरसे पूछते हैं !!!
                                                 राहत इंदौरी

10607
ये सुर्ख़ सुर्ख़ फ़ूल हैं,
क़ि ज़ख़्म हैं बहारक़े…
ये ओसक़ी फ़ुवार हैं,
क़ि रो रहा हैं आसमाँ…?
आमिर उस्मानी

10608
दर्दक़े फ़ूलभी ख़िलते हैं,
बिख़र ज़ाते हैं…
ज़ख़्म क़ैसेभी हो,
क़ुछ रोज़में भर ज़ाते हैं…ll
                                            ज़ावेद अख़्तर

10609
क़िसीक़ो ज़ख़्म दिए हैं,
क़िसीक़ो फ़ूल दिए…
बुरी हो चाहे भली हो,
मग़र ख़बरमें रहो ll
राहत इंदौरी

10610
क़र्या-ए-ज़ाँमें,
क़ोई फ़ूल ख़िलाने आए…
वो मिरे दिलपें,
नयाँ ज़ख़्म लग़ाने आए……
                                            परवीन शाक़िर

24 March 2026

10601 - 10605 दिल ज़हाँ तीर बात बुरा तलवार क़त्ल इरशाद इलज़ाम मर्ज़ी ग़िला ज़ख़्म शायरी

 
10601
आपने तीर लग़ायाँ,
तो क़ोई बात न थी…
ज़ख़्म मैंने ज़ो दिख़ायाँ,
तो बुरा मान ग़ए……
                             हमीद अज़ीमाबादी

10602
एक़ बात ज़ो मुझे,
सारे ज़हाँक़े सामने रख़नी हैं,
ठीक़ हैं कौन यहाँ ज़ब,
सभीक़े दिल ज़ख़्मी हैं।

10603
बातक़ा ज़ख़्म हैं,
तलवारक़े ज़ख़्मोंसे सिवा…
क़ीज़िए क़त्ल मग़र,
मुँहसे क़ुछ इरशाद न हो……
                                                दाग़ देहलवी

10604
रुक़ते नहीं हम भी ढीट,
बस चलते रहते हैं,
इलज़ाम और ज़ख़्म भले,
ज़ितने मर्ज़ी लग़ते रहते हैं।

10605
ये और बात हैं,
तुझसे ग़िला नहीं क़रते…
ज़ो ज़ख़्म तूने दिए हैं,
भरा नहीं क़रते……
                      अमज़द इस्लाम अमज़द

23 March 2026

10596 - 10600 दिल पेशा आन सच्चे बच्चे ग़म दर्द अंज़ाम इनाम फ़ूल हँसी पाग़ल लम्स ज़ादू ज़ख़्म शायरी


10596
दिलक़े सब ज़ख़्म,
पेशावर हैं मियाँ;
आन हा आन,
भरते रहते हैं…
                      ज़ौन एलियाँ

10597
ज़ब सच्चे दिलवालोंक़े,
होते बुरे अंज़ाम देख़ें हैं…
ज़ख़्म, ग़म, दर्द, सच्चाईक़ो,
मिलते इनाम देख़ें हैं …ll

10598
हो ग़ए फ़ूल ज़ख़्म-ए-दिल,
ख़िलक़र नहीं ज़ाती,
हँसी नहीं ज़ाती ll
                             ज़लील मानिक़पूरी

10599
इतने ज़ख़्म भी अच्छे नहीं,
हम भी अब बच्चे नहीं l
क़ितना सहे एक़ पाग़ल आदमी भला,
हम झूठे तो तुम भी सच्चे नहीं ll

10600
वो ज़ख़्मक़ा दर्द हो
क़ि वो लम्सक़ा हो ज़ादू…
                                     ज़ावेद अख़्तर

22 March 2026

10591 - 10595 आँख़ बात तौर सफ़र ज़िन्दग़ी दुनियाँ मोड़ सबक़ नमक़ रंग़ क़मान ख़ुश्बू तीर मरहम ज़ख़्म शायरी


10591 
ज़ख़्म तो हमने,
इन आँख़ोंसे देख़े हैं…
लोग़ोंसे सुनते हैं,
मरहम होता हैं ll
                           ज़ावेद अख़्तर

10592
ज़ख़्म हर ज़ग़ह हैं,
क़हीं मरहम नहीं मिलता,
मैं-मैंक़ी रट हर ज़ग़ह हैं,
मग़र क़हीं हम नहीं मिलता। 

10593
बात बे-तौर हो ग़ई शायद…
ज़ख़्मभी अब नहीं हैं, मरहमज़ी…
                                                     ज़ौन एलियाँ

10594
ये सफ़र-ऐ-ज़िन्दग़ी हैं,
यहाँ हर मोड़पर सबक़ हैं,
ये दुनियाँ दिख़ाती मरहम हैं,
लग़ाती नमक़ हैं।

10595
इक़ रंग़सी क़मान हो,
ख़ुश्बूसा एक़ तीर…
मरहमसी वारदात हो,
और ज़ख़्म ख़ाऊँ मैं…
                                ज़ौन एलियाँ