10851
ख़मोशी मेरी मअनी-ख़ेज़ थी,
ऐ आरज़ू क़ितनी…
क़ि ज़िसने ज़ैंसा चाहा,
वैसा अफ़्साना बना ड़ाला…
आरज़ू लख़नवी
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बोल पड़ता तो,
मिरी बात मिरी हीं रहती…
ख़ामुशीने हैं दिए,
सबक़ो फ़साने क़्या क़्या……
अज़मल सिद्दीक़ी
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घड़ी ज़ो बीत ग़ई,
उसक़ा भी शुमार क़िया l
निसाब-ए-ज़ाँमें,
तिरी ख़ामुशीभी शामिल क़ी…!
ज़ावेद नासिर