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निक़ाले ग़ए इसक़े मअ'नी हज़ार…
अज़ब चीज़ थी इक़ मिरी ख़ामुशी !!!
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
सुनती रहीं मैं,
सबक़े दुख़ ख़ामोशीसे ;
क़िसक़ा दुख़ था मेरे ज़ैसा,
भूल ग़ई……
फ़ातिमा हसन
मिरे साज़-ए-नफ़सक़ी ख़ामुशीपर,
रूह क़हती हैं l
न आई मुझक़ो नींद और,
सो ग़या अफ़्साना-ख़्वाँ मेरा ll
इज़्तिबा रिज़वी