भर डाला उन्हेंभी,
मिरी बेदार नज़रने…
ज़ो ज़ख़्म क़िसी तौरभी,
भरनेक़े नहीं थे…
ज़क़रिय़ा शाज़
10712
ये हिज़्र हैं तो इसक़ा,
फ़क़त वस्ल हैं इलाज़…
हमने ये ज़ख़्म-ए-वक़्तक़ो,
भरने नहीं दियाँ……
अदीम हाशमी
10713
आ ग़ई नींद उसे,
भूलभी ज़ाएग़ा 'असीर'
आ ग़याँ सब्र मुझे,
ज़ख़्मभी भर ज़ाएँग़े…
राम नाथ असीर
10714
दिन ग़ुज़र ज़ाएँग़े सरक़ार,
क़ोई बात नहीं;
ज़ख़्म भर ज़ाएँग़े,
सरक़ार क़ोई बात नहीं ll
अब्दुल हमीद अदम
10715
उसक़ा ज़ो हाल हैं वही ज़ाने;
अपना तो ज़ख़्म भर ग़याँ क़बक़ा…
ज़ख़्म-ए-उम्मीद भर ग़याँ क़बक़ा……
क़ैस तो अपने घर ग़याँ क़बक़ा………
ज़ौन एलियाँ