30 April 2026

10736 - 10740 तीर सितम सीने ज़िग़र इंसाफ़ तलब ज़ब्त हँसी भूल मुंदमिल दरीचा लश्क़र ज़ख़्म शायरी


10736
क़्या तीर-ए-सितम,
उसक़े सीनेमें भी टूटे थे…
ज़िस ज़ख़्मक़ों चीरूँ हूँ,
पैक़ान निक़लते हैं……
                                       मीर तक़ी मीर

10737
हर ज़ख़्म-ए-ज़िग़र,
दावर-ए-महशरसे हमारा…
इंसाफ़-तलब हैं,
तिरी बेदाद-ग़रीक़ा……
मीर तक़ी मीर

10738
ज़ब्त क़रक़े,
हँसीक़ों भूल ग़या…
मैं तो उस ज़ख़्महीक़ो,
भूल ग़याँ……
                             ज़ौन एलियाँ

10739
ज़ख़्म सब मुंदमिल हो ग़ए…
इक़ दरीचा ख़ुला रह ग़याँ……
अज़मल सिराज़

10740
हमेंशा ज़ख़्म पहुँचे हैं मुझीक़ों,
हमेंशा मैं पस-ए-लश्क़र रहा हूँ ll
                                                   ज़ौन एलियाँ

29 April 2026

10731 - 10735 इश्क़ ग़ाफ़िल हुस्न तलवार फ़ेरी पुश्त मुबारक़ दम मसाफ़ हज़ार सूरत नज़र आईना तहज़ीब मक़्तल बिस्मिल क़ातिल नासूर ज़ख़्म शायरी

 
10731
फ़ेरी न थी ज़ो,
पुश्त-ए-मुबारक़ दम-ए-मसाफ़…
थे दो हज़ार ज़ख़्म,
फ़क़त सरसे ता-ब-नाफ़……
                                                      मीर अनीस

10732
ज़ख़्मक़ी सूरत नज़र आते हैं,
हरोंक़े नुक़ूश…
हमने आईनोंक़ों,
तहज़ीबोंक़ा मक़्तल क़र दियाँ ll
राहत इंदौरी

10733
उसने नासूर क़र लिया होग़ा,
ज़ख़्मक़ों शायरी बनाते हुए…ll
                                              अम्मार इक़बाल

10734 
इक़ ज़ख़्मभी,
यारा-ए-बिस्मिल नहीं आनेक़ा
मक़्तलमें पड़े रहिए,
क़ातिल नहीं आनेक़ा
ज़ौन एलियाँ

10735
इश्क़ ग़ाफ़िल ज़ख़्म ग़ता ज़ाएग़ा…
हुस्नक़ी तलवार चलती ज़ाएग़ी……
                                                           नुशूर वाहिदी

28 April 2026

10726 - 10730 ग़ुज़र क़ाफ़िले बहार रंग़ चेहरे महक़ आन ज़ुदाई नस वस्ल हिज़्र ज़ख़्म शायरी

 
10726
इस तरफ़से ग़ुज़रे थे,
क़ाफ़िले बहारोंक़े…
आज़ तक़ सुलग़ते हैं,
ज़ख़्म रहग़ुज़ारोंक़े
                   साहिर लुधियाँनवी

10727
क़ोंई रंग़ तो दो,
मिरे चेहरेक़ो…
फ़िर ज़ख़्म अग़र,
महक़ाओ तो क़्या……?
उबैदुल्लाह अलीम महक़

10728
हर आन इक़ ज़ुदाई हैं,
ख़ुद अपने आपसे,
हर आनक़ा हैं ज़ख़्म,
ज़ो हर आन ग़इए……
                                  ज़ौन एलियाँ

10729
सौ ज़ख़्म थे नस नसमें,
घायल थे रग़-ओ-रेशा…
अहमद फ़राज़

10730
एक़ मलालक़ी ग़र्द समेटे,
मैने ख़ुदक़ों पार क़िया…
क़ैसे क़ैसे वस्ल ग़ुज़ारे,
हिज़्रक़ा ज़ख़्म छुपानेमें……
                                        अज़्म बहज़ाद

27 April 2026

10721 - 10725 दीवान हुनर क़ातिल रस्म फ़ूल ग़ैर बात आज़मा ज़बाँ रूह हवस सिलसिला ज़हर ज़ख़्म शायरी


10721
अपने दीवानक़ों,
ग़लियोंमें लिए फ़िरता हूँ;
हैं क़ोंई ज़ो,
हुनर-ए-ज़ख़्म-नुमाई ले ले…
                                           अहमद फ़राज़


10722
ज़ब लग़ें ज़ख़्म तो,
क़ातिलक़ों दुआ दी ज़ाए…
हैं यहीं रस्म तो,
ये रस्म उठा दी ज़ाए ll
ज़ाँ निसार अख़्तर

10723
लोग़ क़ाँटोंसे बचक़े चलते हैं,
हमने फ़ूलोंसे ज़ख़्म ख़ाए हैं l
तुम तो ग़ैरोंक़ी बात क़रते हो,
हमने अपने भी आज़माए हैं ll
                                              अहमद फ़राज़

10724
चलो क़ि आज़,
सभी पाएमाल रूहोंसे…
क़हें क़ि अपने,
हर इक़ ज़ख़्मक़ों ज़बाँ क़र लें ll
साहिर लुधियाँनवी

10725
अब क़ौन ज़ख़्म ओ ज़हरसे,
रक़्ख़ेग़ा सिलसिला…l
ज़ीनेक़ी अब हवस हैं,
हमें हम तो मर ग़ए……ll
 

26 April 2026

10716 - 10720 दिलरेश समझ ग़म नाख़ुन भारत दाग़ तन लब दहान बात दोस्त याँर भर ज़ख़्म शायरी

 
10716
दोस्त ग़म-ख़्वारीमें,
मेरी सई फ़रमावेंग़े क़्या…
ज़ख़्मक़े भरते तलक़,
नाख़ुन न बढ़ ज़ावेंग़े क़्या……?
                                                  मिर्ज़ा ग़ालिब

10717
ऐ नए दोस्त,
मैं समझूँग़ा तुझे भी अपना…
पहले माज़ीक़ा,
क़ोई ज़ख़्म तो भर ज़ाने दे…
नज़ीर बाक़री

10718
ज़ो ज़ख़्म तनपें हैं,
भारतक़े उसक़ो भरना हैं…
ज़ो दाग़ माथेपें भारतक़े हैं,
मिटाना हैं……!
                                          ज़ावेद अख़्तर

10719
एक़ मैं दिलरेश हूँ,
वैसा ही दोस्त…
ज़ख़्म क़ितनोंक़े सुना हैं,
भर चले……
ख़्वाज़ा मीर दर्द

10720
हमारे लब न सही,
वो दहान-ए-ज़ख़्म सही…
वहीं पहुँचती हैं याँरो,
क़हींसे बात चले……
                                 मज़रूह सुल्तानपुरी

25 April 2026

10711 - 10715 वस्ल वक़्त इलाज़ हिज़्र नींद सब्र दिन ग़ुज़र सरक़ार हाल उम्मीद घर भर ज़ख़्म शायरी


10711
भर डाला उन्हेंभी,
मिरी बेदार नज़रने…
ज़ो ज़ख़्म क़िसी तौरभी,
भरनेक़े नहीं थे…
                           ज़क़रिय़ा शाज़

10712
ये हिज़्र हैं तो इसक़ा,
फ़क़त वस्ल हैं इलाज़…
हमने ये ज़ख़्म-ए-वक़्तक़ो,
भरने नहीं दियाँ……
अदीम हाशमी

10713
आ ग़ई नींद उसे,
भूलभी ज़ाएग़ा 'असीर'
आ ग़याँ सब्र मुझे,
ज़ख़्मभी भर ज़ाएँग़े…
                                 राम नाथ असीर

10714
दिन ग़ुज़र ज़ाएँग़े सरक़ार,
क़ोई बात नहीं;
ज़ख़्म भर ज़ाएँग़े,
सरक़ार क़ोई बात नहीं ll
अब्दुल हमीद अदम

10715
उसक़ा ज़ो हाल हैं वही ज़ाने;
अपना तो ज़ख़्म भर ग़याँ क़बक़ा… 
ज़ख़्म-ए-उम्मीद भर ग़याँ क़बक़ा……
क़ैस तो अपने घर ग़याँ क़बक़ा………

                                                  ज़ौन एलियाँ

23 April 2026

10706 - 10710 मुट्ठि एहसान हाल मरहम तरफ़दार तलबगार शहर छिड़क़ नमक़ ज़ख़्म शायरी

 
10706
मुट्ठियोमें लिए फ़िरते हैं,
नमक़ आज़क़े लोग़…
अपने ज़ख़्मोंक़ो,
क़िसी हाल दिख़ाया न क़रो……

10707
एहसान क़िसीक़ा वो रख़ते नहीं...
मेरा भी लौटा दियाँ...
ज़ितना ख़ायाँ था नमक़ मेरा,
मेरे हीं ज़ख़्मोंपर लग़ा दियाँ......

10708
मरहमक़े नहीं हैं ये,
तरफ़-दार नमक़क़े…
निक़ले हैं मिरे ज़ख़्म,
तलबगार नमक़क़े…!

10709
क़हाँ ज़ख़्म ख़ोल बैठा पग़ले,
ये नमक़क़ा शहर हैं ......!

10710
क़ोई छिड़क़ता हैं,
ज़ख़्मोंपर नमक़ l
क़ोई उनका,
मरहम बन ज़ाता हैं ll

22 April 2026

10701 - 10705 शोर नासेह मज़ा दयार इश्क़ महक़ दुआँ क़ैफ़ियत छिड़क़ पराया ड़र मुट्ठि नमक़ ज़ख़्म शायरी

 
10701
शोर-ए-पंद-ए-नासेहने,
ज़ख़्मपर नमक़ छिड़क़ा
आपसे क़ोई पूछे,
तुमने क़्या मज़ा पायाँ…?
                                        मिर्ज़ा ग़ालिब

10702
हम अपने ज़ख़्मोंपें,
रख़लें नमक़ ज़रूरी हैं…
दयार-ए-इश्क़में,
उनक़ी महक़ ज़रूरी हैं ...!

10703
अपना ज़ख़्म मत दिख़ाना,
क़भी क़िसी सफ़्फ़ाक़क़ो…
दुआँ न पड़ता क़ैफ़ियत क़ी,
ज़ख़्मोंपर नमक़ छिड़क़ता वो…

                               अनुराधा लख़ेपुरिया 'शाक्य'

10704
नमक़ ज़ख़्मोंपें,
रक्ख़ा हैं क़िसीने;
बनाया फ़िर,
पराया हैं क़िसीने…

10705
ड़र रहा था क़ि,
क़हीं ज़ख़्म न भर ज़ाएँ मिरे…
और तू मुट्ठियाँ भर भरक़े,
नमक़ लाई थी……
                                         तहज़ीब हाफ़ी

21 April 2026

10696 - 10700 दिल बहार तमन्ना चाँद सितारों राहत महफ़िल ग़ुलिस्ताँ हुनर ज़िग़र रुख़्सार ज़ख़्म शायरी

 

10696
ज़ख़्म पाए हैं,
बहारोंक़ी तमन्ना क़ी थी…
मैने चाँद और सितारोंक़ी,
तमन्ना क़ी थी……!
                                      साहिर लुधियाँनवी

10697
नहीं ज़रीयाँ-ए-राहत,
ज़राहत-ए-पैक़ाँ…
वो ज़ख़्म-ए-तेग़ हैं ज़िसक़ो,
क़ि दिल-क़ुशा क़हिए……
मिर्ज़ा ग़ालिब

10698
हुवैदा आज़ अपने,
ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ क़रक़े छोड़ूँग़ा…
लहू रो रोक़े महफ़िलक़ो,
ग़ुलिस्ताँ क़रक़े छोड़ूँग़ा…
                                       अल्लामा इक़बाल

10699
हैं ज़राहत और ज़ख़्म और घाव रीश…
भैंसक़ो क़हते हैं भाई ग़ाव मेश ll
मिर्ज़ा ग़ालिब

10700
अब ज़ाक़े क़ुछ ख़ुला,
हुनर-ए-नाख़ुन-ए-ज़ुनूँ…
ज़ख़्म-ए-ज़िग़र हुए,
लब-ओ-रुख़्सारक़ी तरह…
                                       मज़रूह सुल्तानपुरी

20 April 2026

10691 - 10695 महबूब प्यार ज़िंदग़ी ज़िग़र ख़ैरियत पत्थर मुस्क़ुरा ज़ुल्फ़ें लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म शायरी


10691
क़ाम सेहतसे न हैं,
क़ुछ चाराग़रक़ी एहतियाज़…
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़रक़ो हैं,
नमक़-दाँ से ग़रज़…ll
                                    सय्यद मसूद हसन मसूद

10692
ज़िंदग़ीक़ो ज़ख़्मक़ी लज़्ज़तसे,
मत महरूम क़र…
रास्तेक़े पत्थरोंसे,
ख़ैरियत मालूम क़र ll
राहत इंदौरी

10693
शक़ हो ग़याँ हैं,
सीना ख़ुशा लज़्ज़त-ए-फ़राग़…
तक़लीफ़-ए-पर्दा-,
दारी-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र ग़ई…
                                             मिर्ज़ा ग़ालिब

10694
वो याँर हो या महबूब मिरे,
या क़भी क़भी मिलनेवाले…
इक़ लज़्ज़त सबक़े मिलनेमें,
वो ज़ख़्म दिया या प्यार दियाँ…
उबैदुल्लाह अलीम

10695
लज़्ज़त-ए-ग़म बढ़ा दीज़िए,
आप फ़िर मुस्क़ुरा दीज़िए l
चाँद क़ब तक़ ग़हनमें रहें,
अब तो ज़ुल्फ़ें हटा दीज़िए ll

19 April 2026

10686 - 10690 इश्क़ सफ़र तमन्ना मंज़ूर ज़िग़र याँद ग़म उम्र शिक़ार सोज़िश लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म शायरी

 
10686
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-तमन्नासे,
हूँ सरग़र्म-ए-सफ़र,
वर्ना क़ब मंज़ूर थी,
ये ज़ादा-पैमाई मुझे ll
                              एहसान नानपर्वी

10687
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र,
तल्ख़ी-ए-सहबा-ए-ज़ुनूँ…
अब क़ोई चीज़,
तिरे ग़मक़े सिवा याँद नहीं…!
इशरत ज़ालंधरी

10688

इक़ उम्र चाहिए क़ि,
ग़वारा हो नीश-ए-इश्क़…
रक्ख़ी हैं आज़,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र क़हाँ…
                                             अल्ताफ़ हुसैन हाली

10689
देग़ी न चैन लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म,
उस शिक़ारक़ो
ज़ो ख़ाक़े तेरे हाथक़ी,
तलवार ज़ाएग़ा…
मीर तक़ी मीर

10690 

मिज़्ग़ाँ हरीफ़-ए-क़ाविश-ए-नाख़ुन,
न हो सक़ीं …
सोज़िश तो हैं पे,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र नहीं…
                                               अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद

18 April 2026

10681 - 10685 इश्क़ तौहीन नासूर तस्क़ीन दुनियाँ सिलसिला ज़िग़र उम्र ग़वारा शिक़वा लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म शायरी


10681
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्मसे,
तस्क़ीन हुआ क़रती हैं l
इश्क़में क़ौनसी तौहीन,
हुआ क़रती हैं ll
                                  मसऊद अहमद

10682
हमदमो क़ैसे बताएँ,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-दरूँ…
बन ग़या नासूर वो,
ज़ो ज़ख़्म अच्छा हो ग़या ll
इशरत सफ़ी पुरी

10683
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्मसे,
आग़ाह नहीं थी दुनियाँ l
सिलसिला ग़ुलसे चला हैं,
ज़िग़र-अफ़ग़ारीक़ा ll
                                     मानी नाग़पुरी

10684
इक़ उम्र चाहिए कि,
ग़वारा हो नीश-ए-इश्क़...
रक्खी हैं आज़,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र क़हाँ…
अल्ताफ़ हुसैन हाली

10685
न हरग़िज़ शिक़वा-ए-बेग़ानग़ी,
क़रता ज़मानेसे…
ज़ो होता,
आश्ना-ए-लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-शनासाई ll
                                                                 अतहर ज़ियाई

17 April 2026

10676 - 10680 मुक़द्दर साथ हसरत नज़ारा बाँसुरी ऊँग़लि दहन सीना शोला पहलू दीद दिल ज़ख़्म शायरी

 
10676
ज़ख़्म ही तेरा मुक़द्दर हैं,
दिल तुझक़ो क़ौन सँभालेग़ा…
मेरे बचपनक़े साथी,
मेरे साथ ही मर ज़ाना……

                                                     ज़ेब ग़ौरी

10677
ज़ो तेरी दीदने,
बख़्शे वहीं हैं ज़ख़्म बहुत
अब अपने दिलमें,
क़ोई हसरत-ए-नज़ारा नहीं
क़तील शिफ़ाई

10678
आ रख़ दहन-ए-ज़ख़्मपें,
फ़िर ऊँग़लियाँ अपनी…
दिल बाँसुरी तेरी हैं,
बज़ानेक़े लिए आ ll

                              क़लीम आज़िज़

10679
दिलसे उठते हुए शोलोंक़ो,
क़हाँ ले ज़ाएँ…
अपने हर ज़ख़्मक़ो,
पहलूमें छुपानेवाले……!
अख़्तर सईद ख़ान

10680
ज़ख़्मने दाद न दी,
तंग़ी-ए-दिलक़ी, याँ रब…
तीर भी सीना-ए-बिस्मिलसे,
पर-अफ़्शाँ निक़ला……

                                         मिर्ज़ा ग़ालिब

9 April 2026

10671 - 10675 फ़ुर्सत फ़िराक़ लज़्ज़त मेहरबान हयात तसव्वुर निहाँ नश्तर ज़िग़र इंतिज़ार चाँद ख़्वाब चेहरा अश्क़ ज़ख़्म शायरी

 
10671
क़िस फ़ुर्सत-ए-विसालपें हैं,
ग़ुलक़ो अंदलीब…
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़,
ख़ंदा-ए-बे-ज़ा क़हें ज़िसे……
                                               मिर्ज़ा ग़ालिब

10672
ज़ब तिरे शहरसे ग़ुज़रता हूँ…
लज़्ज़त-ए-वस्ल हो क़ि,
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़ l
ज़ो भी हो तेरी मेहरबानी हैं ll
सैफ़ुद्दीन सैफ़

10673

नए तसव्वुरोंक़ा क़र्ब,
अल-अमाँ क़ि हयात…
तमाम ज़ख़्म निहाँ हैं,
तमाम नश्तर हैं……!
                                फ़िराक़ गोरख़पुरी

10674
शब-ए-फ़िराक़ ज़ो ख़ोले हैं,
हमने ज़ख़्म-ए-ज़िग़र…
ये इंतिज़ार हैं,
क़ब चाँदनी निक़लती हैं…?
दाग़ देहलवी

10675

ज़ब ख़्वाब हुईं उसक़ी आँखें,
ज़ब धुँद हुआ उसक़ा चेहरा…
हर अश्क़ सितारा उस शब था,
हर ज़ख़्म अंग़ारा उस दिन था……
                                                    अहमद फ़राज़

8 April 2026

10666 - 10670 दिल ज़िंदगी निख़र हिज़्र ख़ौफ़ पत्थर भेद समझ आँखें नसीब ख़ून ख़ुशी ज़ख़्म शायरी


10666
बहुत अज़ीज़ हैं दिलक़ो,
ये ज़ख़्म ज़ख़्म रुतें…
इन्ही रुतोंमें निख़रती हैं,
तेरे हिज़्रक़ी शाम……
                               मोहसिन नक़वी

10667
मैं चाहता हूँ क़ि,
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हो ज़ाऊँ…
और इस तरह क़ि,
क़भी ख़ौफ़-ए-इंदिमाल न हो ll
ज़व्वाद शैख़

10668
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हुआ,
ज़ब तो मुझपें भेद ख़ुला…
क़ि पत्थरोंक़ो समझती रहीं,
ग़ुहर आँखें……
                                         मोहसिन नक़वी

10669 
मिरे दिलमें ज़ख़्म ही ज़ख़्म हैं,
मुझे ताब-ए-ज़ब्त रही नहीं...
मैं अलम-नसीब हूँ,
आज-कल मिरी ज़िंदगीमें ख़ुशी नहीं ll
अज़ीज़ क़ादरी

10670
ज़ख़्म-हा-ज़ख़्म हूँ,
और क़ोई नहीं ख़ूँ क़ा निशाँ…
क़ौन हैं वो ज़ो मिरे ख़ूनमें,
तर हैं मुझमें……
                                            ज़ौन एलियाँ

7 April 2026

10661 - 10665 फ़ूल निशान रफ़्ता हाल भूल सनम वक़्त ग़म लौट ज़ख़्म शायरी

 
10661
उसक़ा ज़ो हाल हैं,
वही ज़ाने l
अपना तो ज़ख़्म,
भर ग़याँ क़बक़ा ll
                     ज़ावेद अख़्तर

10662
अग़ले वक़्तोंक़े,
ज़ख़्म भरने लग़े...
आज़ फ़िर क़ोई,
भूल क़ी ज़ाए......
                         राहत इंदौरी

10663
रफ़्ता रफ़्ता हर इक़,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
सब निशानात,
फ़ूलोंसे ढक़ ज़ाएँग़े...!
                                  बशीर बद्र

10664
'फ़ाक़िर' सनम-क़देमें,
न आता मैं लौटक़र...
इक़ ज़ख़्म भर ग़याँ था,
इधर लेक़े आ ग़याँ......
                                सुदर्शन फ़ाक़िर

10665
ग़म न क़र, ग़म न क़र,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
ग़म न क़र, ग़म न क़र...
                                  फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

6 April 2026

10656 - 10660 दिल हाथ धोक़ा चालाक़ बयाज़ लग़ा रसाई दुश्मन आज़मा ज़ख़्म शायरी


10656
ज़ख़्म लग़ाक़र उसक़ा भी,
क़ुछ हाथ ख़ुला l
मैं भी धोक़ा ख़ाक़र,
क़ुछ चालाक़ हुआ…
                                          ज़ेब ग़ौरी

10657
यूँ ही इक़ ज़ख़्मपर,
दे दी थी इस्लाह…
सो अब लेक़र,
बयाज़ आने लग़ा हैं
फ़रहत एहसास

10658
इस बार हूँ दुश्मनक़ी,
रसाईसे बहुत दूर…
इस बार मग़र,
ज़ख़्म लग़ाएग़ा क़ोई और…
                                        आनिस मुईन

10659
क़्या क़रे मेरी,
मसीहाईभी क़रनेवाला
ज़ख़्म ही ये मुझे,
लग़ता नहीं भरनेवाला…
परवीन शाक़िर

10660
हाथ ही तेग़-आज़माक़ा,
क़ामसे ज़ाता रहा…
दिलपें इक़ लग़ने न पायाँ,
ज़ख़्म-ए-क़ारी हाए हाए…
                                       मिर्ज़ा ग़ालिब

5 April 2026

10651 - 10655 दिलासे ग़हरा रूह सोच याँद दरियाँ ग़हराई फ़ुर्सत उदास क़सक़ दिल आँख़ ज़ख़्म शायरी

 
10651
लोग़ देते रहें,
क़्या क़्या न दिलासे मुझक़ो
ज़ख़्म ग़हरा ही सही,
ज़ख़्म हैं भर ज़ाएग़ा……
                                        शक़ेब ज़लाली

10652
आपक़ी आँख़से ग़हरा हैं,
मिरी रूहक़ा ज़ख़्म…
आप क़्या सोच सकेंग़े,
मिरी क़ो
मोहसिन नक़वी

10653
ये मसीहाई,
उसे भूल ग़ई हैं 'मोहसिन'
याँ फ़िर ऐसा हैं,
मिरा ज़ख़्म ही ग़हरा होग़ा…
                                         मोहसिन नक़वी

10654
क़िसने देख़ें हैं,
तिरी रूहक़े रिसते हुए ज़ख़्म…
क़ौन उतरा हैं,
तिरे क़ल्ब क़ी ग़हराईमें
रईस अमरोहवी

10655
न अब वो याँदोंक़ा चढ़ता दरियाँ,
न फ़ुर्सतोंक़ी उदास बरख़ा…
यूँही ज़रासी क़सक़ हैं दिलमें,
ज़ो ज़ख़्म ग़हरा था भर ग़याँ वो ll
                                                  नासिर क़ाज़मी

4 April 2026

10646 - 10650 दिल निग़ार-ख़ाने ख़ूबसूरत बिछड़ा जिस्म अबरू ज़ख़्म शायरी

 
10646
देख़ दिलक़े निग़ार-ख़ानेमें,
ज़ख़्म-ए-पिन्हाँक़ी हैं निशानी भी…
फ़िराक़ गोरख़पुरी

10647
अब तो ये आरज़ू हैं क़ि,
वो ज़ख़्म ख़ाइए…
ता-ज़िंदग़ी ये दिल,
न क़ोई आरज़ू क़रे
अहमद फ़राज़

10648
ज़ख़्म आँख़ोंक़े भी सहते थे,
क़भी दिलवाले…
अब तो अबरूक़ा इशारा,
नहीं देख़ा ज़ाता……
                                         मोहसिन नक़वी

10649
बिछड़ा हैं ज़ो इक़ बार,
तो मिलते नहीं देख़ा…
इस ज़ख़्मक़ो हमने,
क़भी सिलते नहीं देख़ा…
परवीन शाक़िर

10650
अभी हम ख़ूबसूरत हैं,
हमारे जिस्म औराक़-ए-ख़िज़ानी हो गए हैं l
और रिदा-ए-ज़ख़्म से आरास्ता हैं ll
फ़िर भी देख़ो तो
हमारी ख़ुश-नुमाईपर कोई हर्फ़,
और कशीदा-कामतीमें ख़म नहीं आया…
अहमद फ़राज़

3 April 2026

10641 - 10645 दिल नज़र अश्क़ चूम दस्त ज़िग़र नींद ख़्वाब वहशत आफ़त ज़ौहर सर देख़ ज़ख़्म शायरी

 

10641
हर एक़ ज़ख़्मक़ो,
अश्क़ोंसे धोक़े चूम लिया;
मैं ऐसे ठीक़ हुआ,
उसक़ी देख़-भालक़े बाद…!
                                              वरुन आनन्द

10642
नज़र लग़े न क़हीं उसक़े,
दस्त-ओ-बाज़ूक़ो…
ये लोग़ क़्यूँ मिरे,
ज़ख़्म-ए-ज़िग़रक़ो देख़ते हैं…?
मिर्ज़ा ग़ालिब

10643
नींद पिछली सदीक़ी ज़ख़्मी हैं;
ख़्वाब अग़ली सदीक़े देख़ते हैं ll
                                                   राहत इंदौरी

10644
वहशत-ए-ज़ख़्म-ए-वफ़ा,
देख़ क़ि सर-ता-सर दिल…
बख़ियाँ जूँ ज़ौहर-ए-तेग़,
आफ़त-ए-ग़ीराई हैं…ll
मिर्ज़ा ग़ालिब

10645
रुत बदलने लग़ी,
रंग़-ए-दिल देख़ना,
रंग़-ए-ग़ुलशनसे अब,
हाल ख़ुलता नहीं l
ज़ख़्म छलक़ा क़ोई,
याँ क़ोई ग़ुल ख़िला…
अश्क़ उमडे क़ि,
अब्र-ए-बहार आ ग़या…
                              फ़ैज़ अहमद फ़ैज़