2 November 2017

1901 - 1905 इश्क ज़िंदगी बदनाम चर्चे खयाल तारीफ दिवाना फितरत सफ़र ग़ज़ल बरसात रंजिश दामन शायरी


1901
इश्कमें ना हुए बदनाम,
तो क्या इश्क किया...!
चर्चे जो ना हुए सरेआम,
तो क्या इश्क किया...!!

1902
सोचता हूँ तेरी तारीफमें कुछ लिखुं !
फिर खयाल आया की,
कहीं पढने वाला भी तेरा,
दिवाना ना हो जाए...!!!

1903
कलतक उड़ती थी जो मुँह तक,
आज पैरसे लपट गई...
चंद बूँदे क्या बरसी बरसात कि,
धूल कि फितरत ही बदल गई...!

1904
क़ोई सफ़र यूँ भी हो,
क़ी तुम हमदम बनो..
रास्ते हो क़ाग़ज़क़े,
और तुम ग़ज़ल बनो....

1905
ज़रासी रंजिशपर,
ना छोड़, किसी अपनेका दामन...
ज़िंदगी बीत जाती हैं,
अपनोको अपना बनानेमें...!

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