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बेवज़ह ख़ामोश नहीं हूँ मैं,
क़ुछ तो बर्दाश्त क़िया होग़ा मैने।
न ज़ाने क़ौनसा ग़िला हैं तुझक़ो हमसे…
क़ि तू ख़ामोश रहता हैं।l
तड़प रहें हैं हम,
तुमसे एक़ अल्फाज़क़े लिए…
तोड़ दो ख़ामोशी,
हमें ज़िन्दा रख़नेक़े लिए…!
मेरी ख़ामोशीभी एक़ पुक़ार हैं,
ग़ौरसे सुन…
शायद वो मिल ज़ाए,
ज़ो मैं लफ़्ज़ोंमें न क़ह सक़ा !