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क़िस क़िसक़ो बताएँग़े,
ज़ुदाईक़ा सबब हम…
तू मुझसे ख़फ़ा हैं,
तो ज़मानेक़े लिए आ……!
अहमद फ़राज़
तू हम-दमोंसे ज़ुदा रह क़ि,
टूट ज़ाता हैं…
हबाबक़े ज़ो क़रीं,
दूसरा हबाब आया ll
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
फ़क़ीर मिज़ाज़ हूँ,
मैं अपना अंदाज़,
औरोंसे ज़ुदा रख़ता हूँ l
लोग़ मस्ज़िदोमें ज़ाते हैं,
मैं अपने दिलमें ख़ुदा रख़ता हूँ ll