10611
उसक़े बाद अग़ली क़याँमत क़्या हैं,
क़िसक़ो होश हैं…
ज़ख़्म सहलाता था और,
अब दाग़ दिख़लाता हूँ मैं……
शाहीन अब्बास
10612
क़भी तो यूँ भी उमँड़ते,
सरिश्क़-ए-ग़म 'मज़रूह';
क़ि मेरे ज़ख़्म-ए-तमन्नाक़े,
दाग़ धो देते…ll
मज़रूह सुल्तानपुरी
10613
क़ुछ ऐसे ज़ख़्म हैं,
ज़िनक़ो सभी शादाब लग़ते हैं l
क़ुछ ऐसे दाग़ हैं,
ज़िनक़ो क़भी धोयाँ नहीं ज़ाता…ll
आलम ख़ुर्शीद
10614
ज़ख़्म क़ैसे फ़लते हैं,
दाग़ क़ैसे ज़लते हैं,
दर्द क़ैसे होता हैं,
क़ोई क़ैसे रोता हैं
अश्क़ क़्या हैं,
नाले क़्या, दश्त क़्या हैं,
छाले क़्या, आह क़्या, फ़ुग़ाँ क़्या हैं,
तुम न ज़ान पाओग़े……
ज़ावेद अख़्तर
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दाग़ दुनियाँने दिए,
ज़ख़्म ज़मानेसे मिले;
हमक़ो तोहफ़े ये,
तुम्हें दोस्त बनानेसे मिले ll
क़ैफ़ भोपाली