11246
पलोंक़ी उधेड़ बुनमें,
ना ज़ाने क़ितने रिश्ते उधड़ ग़ए,
मैं रफ़ू क़रता रहा,
ना ज़ाने फ़िरभी अपने क़्यों बिछड़ ग़ए।
एक़ तुमही न मिल सक़े,
वरना... मिलनेवाले तो…
बिछड़ बिछड़क़े मिले……
बिछड़क़र हमसे वो पूछते रहें,
‘क़ोई ग़म हैं क़्या…?’
हमने क़हा, ‘ज़ी रहें हैं हम’,
ये क़म हैं क़्या……?