12 February 2018

2346 - 2350 फ़साना फासले क़र्ज़ मर्ज़ी ज़िन्दगी क़दम रिश्ते ज़ला ख़त फ़ज़ा रक़्स शरर शायरी



2346
"खुल जाती हैं गांठें सारी,
बस जरासे जतनसे...!
मगर लोग कैचियाँ चलाकर,
सारा फ़साना बदल देते हैं...!"

2347
फासले इस कदर,
आज हैं रिश्तोंमें,
जैसे कोई क़र्ज़ चुका रहा हो,
किस्तोमें.......!

2348
अपनी मर्ज़ीसे भी,
दो चार क़दम चलने दे ज़िन्दगी...l
हम तेरे कहनेपें,
चले हैं बरसों...ll

2349
धीरे धीरे बहुत कुछ बदल रहा हैं...
लोग भी... रिश्ते भी...
और कभी कभी,
हम खुद भी.......

2350
ज़ला दिए हैं क़िसीने,
पुराने ख़त वर्ना...
फ़ज़ामें ऐसा तो,
रक़्स-ए-शरर नहीं होता l
             अब्दुल वहाब सुख़न

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