22 February 2018

2386 - 2390 दिल दुनियाँ जिंदगी गुलशन लफ्ज़ ज़िक्र गम ज़ीनत सिलसिला वास्ता आदत सपना सख्श अंजाम शायरी


2386
मुक्कमलसी लगती हैं,
मेरी शायरी...!!!
लफ्ज़ जब सारे मेरे होते हैं,
और ज़िक्र सारा तेरा...!!!

2387
गुलशनकी फ़कत फुलोंसे नहीं,
काँटोसे भी ज़ीनत होती हैं...
जीनेके लिए इस दुनियाँमें,
गमकी भी जरुरत होती हैं.......

2388
ठहर ज़ाओ, बोसे लेने दो...
न तोड़ो सिलसिला l
एक़क़ो क़्या वास्ता हैं,
दूसरेक़े क़ामसे.......?
               परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

2389
फिरसे वो सपना सजाने चला हूँ...
उमीदोंके सहारे...
दिल लगाने चला हूँ...
पता हैं कि...
अंजाम बुरा ही होगा मेरा...
फिर भी...
किसीको अपना बनाने चला हूँ.......

2390
तुम मेरी जिंदगीका,
वो एकलौता सच हो,
जिसके बारेमें मैने दुनियाँके हर सख्शसे,
झूठ कहा हैं.......

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