2471
यूँ तो बीतने क़ो,
पूरी उम्र बीत ज़ाती हैं...
क़रना हो इंतज़ार तो,
दुरी एक़ पल क़ि सताती हैं...
2472
तमन्ना हैं…
इस बार बरस ज़ाये,
ईमानक़ी बारिश...
लोगोंक़े ज़मीरपर,
धूल बहुत हैं…
.
2473
ज़ब रूहमें उतर ज़ाता हैं,
ग़हरे इश्क़क़ा समंदर...
लोग़ जिंदा तो रहते हैं,
मग़र क़िसी औरक़े अंदर...
.
2474
इश्कभी अजीब
होता हैं।
अपनोको
खोकर मीलता हैं।
फिर भी इश्कमें
मे ही इन्सान जिता हैं।
तभी तो उसे
इश्क कहते हैं।
2475
हम उनके जैसे
मतलबी और धोखेबाज़ नहीं हैं,
जो की चाहनेवालोको धोखा
दे,
बस वो ये समझ ले
की हमें समझना
हर किसीके
बसकी बात
नहीं.....
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