20 March 2018

2506 - 2510 अश्क फ़नकार जवान ज़िंदगी तमन्ना ख़ुशी आँख क़लम नशा जिक्र होठ धागे शायरी


2506
अश्कोंमें क़लम डुबो रहा हैं,
फ़नकार जवान हो रहा हैं l
                             सैफ़ ज़ुल्फ़ी

2507
क़भी फुरसतसे हिसाब क़रेंगे,
तुझसे  या . . .
की मैने गुनाह ज्यादा किये,
या तूने जख्म ज्यादा दिए...

2508
एक जिक्र मैं होठोंसे कर दूँ,
और तू हाँ क़ दे,
चल कोई बीना बातकी,
बात क़ दे . . . . . . .!

2509
आपकी यादोंके बिना,
मेरी ज़िंदगी अधूरी हैं;
आप मिल जाओ तो,
हर तमन्ना पूरी हैं;
आपके साथ जुडी हैं,
अब मेरी हर ख़ुशी;
बाकी सबके साथ हँसना तो,
बस मजबूरी हैं!

2510
बिन धागेकी सुईसी ...
बन गयी हैं ये ज़िंदगी,
सीलती कुछ नहीं ...
बस चुभती चली जा रही हैं ...!

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