16 April 2018

2611 - 2615 जिन्दगी तकदीर सिलसिले वक़्त नमक शहद शौक आरजू कोशिश तमन्ना सपने ज़ज़्बात शख़्स शीशा लफ़्ज़ पत्थर शायरी


2611
अपनी तकदीरमें तो कुछ...
ऐसे ही सिलसिले लिखे हैं;
किसीने वक़्त गुजारनेके लिए...
अपना बनाया;
तो किसीने अपना बनाकर...
'वक़्त' गुजार लिया!

2612
कभी नीमसी जिंदगी
कभी नमकसी जिंदगी 

ढूँढते रहे उम्रभर,
एक शहदसी जिन्दगी...

ना शौक बङा दिखनेका,
ना तमन्ना भगवान होनेकी...

बस आरजू जन्म सफल हो,
कोशिश इंसान होनेकी...

2613
फूल बनकर मुस्कुराना जिन्दगी हैं,
मुस्कुराके गम भूलाना जिन्दगी हैं,
मिलकर लोग खुश होते हैं तो क्या हुआ,
बिना मिले दोस्ती निभाना भी जिन्दगी हैं l

2614
बिखरी पडी थी किरचे चाँदकी,
कल रात मेरे आँगनमें;
मैने हौले हौलेसे उठाकर जूडेमें सजा ली,
रात तो आती ही हैं ना सपने सजानेके लिए...

2615
मैं क़हाँ ज़ाऊँ,
ज़ज़्बातक़ा शीशा लेक़र...
लफ़्ज़ पत्थरक़ा यहाँ,
हर शख़्स चला देता हैं...

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