1 December 2019

5111 - 5115 वक्त दर्द याद जज़्बात इनकार पलक़ छलक़ ताल्लुक आँसू आँख शायरी


5111
इनकार कर दिया आँसूओंने,
आँखमें आनेसे...
क्यूँ गिराते हो हमे,
एक गिरे हुए शख्सकी खातिर...

5112
मेरी आँख़ोंक़े आँसू क़ह रहें मुझसे,
अब दर्द इतना क़्या क़ि सहा नहीं ज़ाता l
रोक़ पलक़ोंसे ख़ुलक़र छलक़ने दे,
अब यूँ इन आँख़ोंमें रहा नहीं ज़ाता ll

5113
कब तक बहाना बनाते रहें,
आँखमें कचरा चले जानेका...
ले आज सरेआम कहते हैं,
तुझे याद करके रोते हैं.......!

5114
कमी तो होनी ही है,
पानीकी, शहरमें...
किसीकी आँखमें बचा है,
किसीके जज़्बातमें...

5115
वक्तकी धुंधमें हरदम,
छुप जाते हैं ताल्लुक...
बहुत दिनों तक किसीकी,
आँखसे ओझल ना रहिये...

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