5221
मेरी दहलीज़पें आ रुक़ी हैं,
दस्तक़-ए-मुहब्बत !
मेहमान नवाज़ीक़ा शौक़ भी हैं,
और उज़ड़ ज़ानेक़ा खौफ़ भी...
5222
फुरसत निकालकर आओ,
कभी
हमारी महफ़िलमें...
लौटते वक्त दिल
नहीं पाओगे,
अपने
सीनेमें.......!
5223
बड़ी मुद्दतोंमें सीखा
था हमनें,
तन्हा
जीनेका हुनर...
आपने आकर
फिर,
महफ़िलोंकी
आरज़ू जगा दी...!
5224
मेरी महफ़िलमें नज़्मकी,
इरशाद अभी बाकी हैं...
कोई थोड़ा भीगा हैं,
अभी पूरी
बरसात बाकी हैं...!
5225
महफ़िलमें जो
हमे,
दाद देनेसे कतराते हैं...
सुना हैं तन्हाईयोंमें वो,
हमारी
शायरी गुनगुनाते हैं...!
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