5 August 2026

11171 - 11176 दिल क़दर मुसलसलक़दर शिद्दतें ज़ुदाई बेवफ़ाई साथ ख़ुश्क़ पलक़ें दर्द ख़ौफ़ ज़ुदाई शायरी

 
उस 11171 
इस क़दर मुसलसल थी,
 से मैने बेवफ़ाई क़ी……
                                       अहमद फ़राज़

11172
तेरा साथ छूटा तो,
सपनेभी अधूरे रह ग़ए…
ज़ुदाईक़ी आग़में,
दिल ज़लता रह ग़या…

11173
ख़ुश्क़ ख़ुश्क़सी पलक़ें,
और सूख़ ज़ाती हैं……
मैं तिरी ज़ुदाईमें,
इस तरह रोता हूँ……
                               अहमद राही
11174
दर्द छुपा हैं सीनेमें,
तेरे नामक़ा 
ज़ुदाईक़ा ये ज़ख़्म,
क़भी न भरेग़ा……

11175
बस एक़ ख़ौफ़ था ज़िंदा,
तिरी ज़ुदाईक़ा…
मिरा वो आख़िरी दुश्मनभी,
आज़ मारा ग़या……
                                          ख़ालिद मलिक़ साहिल

4 August 2026

11166 - 11170 प्यार मेहरबाँ नज़र शुक़्रिया तोहफ़ा फ़ैसला फ़ासला लहर आधा आँख़ रुख़सत ज़ुदाई शायरी


11166
उस मेहरबाँ नज़रक़ी,
इनायतक़ा शुक़्रिया l
तोहफ़ा दिया हैं,
हमक़ो ज़ुदाईक़ा ll

11167
तुझसे ज़ुदा न होंगे,
ये सोचा था उम्रभर l
ये फ़ैसला तिरा था,
जो ये फ़ासला हुआ ll
रुबीना अया

11168
उदासीक़ी लहरोंमें,
बहता रहता हूँ l
तेरी ज़ुदाईमें,
ख़ोता रहता हूँ ll

11169
तो क़्या सचमुच,
ज़ुदाई मुझसे क़र ली…
तो ख़ुद अपनेक़ो,
आधा क़र लिया क़्या…?
ज़ौन एलिया

11170
ज़ुदाईक़ा हमें क़्या,
वो हसते हसते सह्य लेंग़े… 
आँख़ोमें उनक़े प्यार दिख़ाई दे,
तो मानेसे रुख़सत क़र लेंग़े !

2 August 2026

11161 - 11165 मोहोबत पैरहन ख़ुशबू घबरा भूल ग़ुरूर ज़ंग़ धमक़ि बदमाशि क़दर शिक़वा-ए-ज़ुदाई शायरी

 

11161
ज़ब अपने पैरहनसे,
ख़ुशबू तुम्हारी आई…
घबराक़े भूल बैठे हम,
शिक़वा-ए-ज़ुदाई……!

11162
क़ोई रूठे तो,
उसे ज़ल्दी मना लिया क़रो…l
ग़ुरूरक़ी ज़ंग़में अक़्सर,
ज़ुदाई ज़ीत ज़ायाँ क़रती हैं ll

11163
धमक़ियाँ देता हैं,
और वो भी ज़ुदाईक़ी...
मोहोबतमें भी देख़ो…
बदमाशियाँ मेरे याँरक़ी…...

11164
आँख़ें हैं कि,
ख़ाली नहीं रहती हैं, लहूसे…
और ज़ख़्म-ए-ज़ुदाई हैं,
भरभी नहीं जाता……
अहमद फ़राज़

11165
लाऊँग़ा क़हाँसे,
ज़ुदाईक़ा हौसला…
क़्यों क़ोंई इस क़दर,
मेरे क़रीब आ रहा हैं ?

31 July 2026

11156 - 11160 मोहब्बत ज़िन्दग़ी सुलग़ती इल्म ड़र ईमान ड़र अंत हुक़ूमत ज़ुल्म दाव ज़ुल्म शायरी

 
11156
चाहे दावपें लग़ ज़ाये ज़िन्दग़ी,
दावपें ईमान लग़ न पाए क़भी ;
सुलग़ती रहें दिलमें आग़ इल्मक़ी,
चाहे हमपें हो हुक़ूमत ज़ुल्मक़ी।

11157
ज़ुल्म ज़ालिमक़े क़म नहीं होते,
सर हमारेभी क़म नहीं होते l
ये मोहब्बत हैं और मोहब्बतक़े 
फ़ैसले एक़दम नहीं होते ll

11158
ड़र और ज़ुल्मक़ा यारो,
क़ोई अंत नहीं…
ख़ुदक़ो ढूँड़ रहें हैं लोग़,
अब रावनमें……
                                     राज़ ख़ेती

11159
इन क़िताबोंने,
बड़ा ज़ुल्म क़िया हैं मुझपर…
इनमें इक़ रम्ज़ हैं,
ज़िस रम्ज़क़ा मारा हुआ ज़ेहन…

11160
मैं मुल्क-बदर सब्रभी,
क़र सक़ती थी लेक़िन…
ये देख़ना था,
ज़ुल्मक़ी सरहद हैं क़हाँ तक़……
                                                        मीना नक़वी

29 July 2026

11151 - 11155 इश्क़ हक़ीक़त याद क़यामत होंठ ज़र्फ़ आईना टूट लुत्फ़से ड़र ज़ब्ह क़ज़ा ज़ुल्म शायरी

 
11151
क़िया इश्क़-ए-मज़ाज़ीने,
हक़ीक़त आश्ना मुझक़ो ;
बुतोंने ज़ुल्म वो ढाया क़ि,
याद आया ख़ुदा मुझक़ो ll
ख़िज़्र नाग़पुरी

11152
तेरे हर ज़ुल्मक़ा मेरे ऊपर,
हिसाब तुझक़ो याद दिलाएंग़े…
क़यामत होनेसे पहले,
तुझक़ो हर बार यह एहसास दिलाएंग़े।

11153
ज़ुल्म सहक़े भी,
मैने होंठ सी लिए 'ग़ाज़ी' ;
एक़ ज़र्फ़ उनक़ा हैं,
एक़ ज़र्फ़ मेरा हैं……
                                शाहिद ग़ाज़ी

11154
आईना भी उन्हें देख़क़े,
शर्मा ग़या होग़ा l
उनक़े ज़ुल्म देख़क़े,
ख़ुद बख़ुद टूट ग़या होग़ा…

11155
ज़ुल्मसे ग़र ज़ब्हभी क़र दो,
मुझे परवा नहीं…
लुत्फ़से ड़रता हूँ,
ये मेरी क़ज़ा हो ज़ाएग़ा…
                                    बेख़ुद देहलवी

28 July 2026

11146 - 11150 ज़िन्दग़ी बात लोग़ आदत दरबार सुनवाई आईने चेहरा नज़र फ़रेबी इंतिहा सायाँ ज़ुल्फ़े परीशाँ ज़ुल्म शायरी

 
11146
बात ये हैं क़ी,
लोग़ बदल ग़ए हैं...
ज़ुल्म ये हैं क़ी,
वो मानते भी नहीं...

11147
क़ुछ ज़ुल्म ओ सितम,
सहनेक़ी आदत भी हैं हमक़ो
क़ुछ ये हैं क़ि
दरबारमें सुनवाई भी क़म हैं
ज़िया ज़मीर

11148
ज़िन्दग़ी अपने आईनेमें,
तुझे अपना चेहरा नज़र नहीं आता,
ज़ुल्म क़रना तो तेरी आदत हैं,
ज़ुल्म सहना मग़र नहीं आता।
नरेश क़ुमार ‘शाद’

11149
ख़ुद-फ़रेबीमें मुब्तला रख़क़र,
ज़ुल्मक़ी तुमने इंतिहा क़ी हैं ll
अज़ीम हैंदराबादी

11150
इक़ न इक़ ज़ुल्मतसे,
ज़ब वाबस्ता रहना हैं ‘ज़ोश’,
ज़िन्दग़ीपर सायाँ-ए-ज़ुल्फ़े-ए-परीशाँ,
क़्यों न हो।
                                                        ज़ोश मलीहाबादी

27 July 2026

11141 - 11145 मोहब्बत पत्ता हाल मक़ान महफ़ूज़ ग़ुलाब क़ाँटों टांक़े समेट लम्हे उम्र हक़ीम बिख़र शायरी

 
11141
ख़ुदक़ो बिख़रने मत देना क़भी,
क़िसी हालमें…
लोग़ ग़िरे हुए मक़ानक़ी,
ईंटे तक़ ले ज़ाते हैं ll

11142
ख़ुदक़ो बिख़रते देख़ते हैं,
क़ुछ क़र नहीं पाते हैं l
फ़िरभी लोग़,
ख़ुदाओं ज़ैसी बातें क़रते हैं ll
इफ़्तिख़ार आरिफ़

11143
क़ितना महफ़ूज़ था,
ग़ुलाब क़ाँटोंक़ी ग़ोदमें...!
लोग़ोंक़ी मोहब्बतमें,
पत्ता पत्ता बिख़र ग़या...!!

11144
बस यह क़हक़र,
टांक़े लग़ा दिए उस हक़ीमने…
क़ी ज़ो अंदर बिख़रा हैं,
उसे ख़ुदा भी नहीं समेट सक़ता...!!!
                                                                   मुंजाल  

11145
एक़ लम्हेमें,
बिख़र ज़ाता हैं ताना-बाना…
और फ़िर उम्र ग़ुज़र ज़ाती हैं,
यक़ज़ाईमें ll
                                          अहमद मुश्ताक़

26 July 2026

11136 - 11140 ज़िंदग़ी ज़ीवन मुस्क़ुरा बात लफ़्ज़ चाँदनी शब ज़ुल्फ़ छोटे बड़े उलझ बिख़रे निख़र शायरी



11136
वो मुस्क़ुराक़े,
क़ोई बात क़र रहा था ‘शुमार’…
और उसक़े लफ़्ज़ भी थे,
चाँदनीमें बिख़रे हुए……!
                                                 अख़्तर शुमार

11137
शबक़ी तारीक़ी बढ़ती हीं ज़ाए…
क़ौन आता हैं ज़ुल्फ़ बिख़राए……!
वेद राही

11138
ज़ब छोटे थे, तब बड़ी बड़ी,
बातोमें बह ग़ए और...
ज़ब बड़े हुए तब, छोटी-छोटी,
बातोमें बिख़र ग़ए……ll

11139
बड़ा सुंदर सा सबब हैं ज़ीवन क़ा,
उलझोग़े नहीं तो सुलझोग़े क़ैसे…? 
बिख़रोग़े नहीं तो निख़रोग़े क़ैसे...?

11140
सुना भी क़ुछ नहीं,
क़हा भी क़ुछ नहीं,
पर ऐसे बिख़रे हैं ज़िंदग़ीक़ी क़शमक़शमें…
क़ि टूटाभी क़ुछ नहीं…!

25 July 2026

11131 - 11135 दिल हवा चेहरे लटें तहज़ीब आस ज़िम्मा टूट आईने फ़साना समेंटे बिख़र शायरी

 
11131
ओ हवा...
ज़रा तहज़ीबसे बहा क़र l

क़िसीक़ी लटें,
चेहरेपर बिख़र ज़ाती हैं…!

11132
आसपें तेरी बिख़रा देता हूँ,
क़मरेक़ी सब चीज़ें…
आस बिख़रनेपर सब चीज़ें,
ख़ुदहीं उठाक़े रख़ता हूँ ll
अज़मल सिद्दीक़ी

11133
क़ाश क़ुछ ज़िम्मा,
तुमभी तो उठा लेते…
टूटनेसे ना सहीं…
बिख़रनेसे तो बचा लेते……

11134
आईने और दिलक़ा,
बस एक़हीं फ़साना हैं,
टूटक़र एक़ दिन दोनोंक़ो,
बिख़र ज़ाना हैं।

11135
अक़्स-ए-ख़ुशबु हूँ,
बिख़रनेसे न रोक़े क़ोई…
और बिख़र ज़ाऊँ तो,
मुझक़ो न समेंटे क़ोई……

24 July 2026

11126 - 11130 ज़िंदगी धड़क़ने टूट याँद हिसाब अज़ीब ज़ुल्म बहाने अवसर बिख़र शायरी


11126 
धड़क़ने टूटक़र,
बिख़रने लग़ती हैं;
ज़ब याँद तुम बे-हिसाब,
आने लग़ते हो…!

11127
उसने क़हा...
बिख़रे बिख़रेसे लग़ते हो तुम,
मैने क़हा...
ख़ुशबू हूँ, बिख़रना रवायत हैं मेरी।

11128
और थोड़ासा बिख़र ज़ाऊँ,
यहीं ठानी हैं…
ज़िंदगी मैने अभी,
हार कहाँ मानी हैं…?

11129
अज़ीब ज़ुल्म क़रती हैं,
आपक़ी ये याँदें,
सोचू तो बिख़र ज़ाऊँ
ना सोचू तो क़िधर ज़ाऊँ…!

11130
बिख़रनेक़े बहाने तो,
बहुत मिल ज़ायेग़े,
आओ हम ज़ुड़नेक़े...?
अवसर खोजें।

23 July 2026

11121 - 11125 उम्मीद ज़िय्यत क़ाविश मँज़िले क़श्ति तूफ़ान नसीब शिक़वा ख़्वाब तमन्ना ज़वानी तक़दीर दामन हासिल शायरी

11121
मेरी उम्मीदोंक़ा हासिल,
मिरी क़ाविशक़ा सिला…
एक़ बे-नाम,
ज़िय्यतक़े सिवा क़ुछभी नहीं……!
                                                 साहिर लुधियानवी

11122
मँज़िले बड़ी ज़िद्दी होती हैं,
हासिल क़हाँ नसीबसे होती हैं !
मग़र वहाँ तूफ़ानभी हार ज़ाते हैं,
ज़हाँ क़श्तियाँ ज़िदपर होती हैं !

11123
इमारत क़िया शिक़वा-ए-ख़ुसरवीभी हो,
तो क़्या हासिल…
न ज़ोर-ए-हैदरी तुझमें,
न इस्तिग़ना-ए-सलमानी ll
                                                          अल्लामा इक़बाल

11124
क़्या हासिल क़रोग़े,
उसे हासिल क़र,
ज़ो तुम्हें हासिल ही नहीं
क़रना चाहता।

11125
मेरी दरमाँदा ज़वानीक़ी तमन्नाओंक़े मुज़्महिल,
ख़्वाबक़ी ताबीर बता दे मुझक़ो,
तेरे दामनमें ग़ुलिस्तांभी हैं वीरानेभी,
मेरा हासिल मेरी तक़दीर बता दे मुझक़ो ।
                                                                         साहिर लुधियानवी

22 July 2026

11116 - 11120 दिल प्यार ज़ुस्तुज़ू रवाँ मंज़िल उदासि दुआ ग़हरे समुंदर सुक़ूत मौज़ ज़हाँ ख़ुशियाँ नज़र क़ाबिल हासिल शायरी


11116 
हमारे घरक़ा,
पता पूछनेसे क़्या हासिल…?
उदासियोंक़ी क़ोई,
शहरियत नहीं होती……
                                          वसीम बरेलवी

11117
हैं रवाँ उस राहपर,
ज़िसक़ी क़ोई मंज़िल न हो ;
ज़ुस्तुज़ू क़रते हैं उसक़ी,
ज़ो हमें हासिल न हो ll
मुनीर नियाज़ी

11118
हज़ार बार ज़ो माँग़ा क़रो,
तो क़्या हासिल...?
दुआ वहीं हैं,
ज़ो दिलसे क़भी निक़लती हैं !
                                          दाग़ देहलवी

11119
तुमसे हासिल हुआ,
इक़ ग़हरे समुंदरक़ा सुक़ूत !
और हर मौज़से लड़नाभी,
तुम्हीसे सीख़ा……!!!
ज़ेहरा निग़ाह

11120
दो-ज़हाँक़ी आज़ ख़ुशियाँ,
हो ग़ईं हासिल मुझे…
आपक़ी नज़रोंने समझा,
प्यारक़े क़ाबिल मुझे…..!
                              राज़ा मेहदी अली ख़ाँ

21 July 2026

11111 - 11115 दिल इश्क़ वफ़ा हद लम्हे तवज़्ज़ोह आरज़ू सानेहा वक़्त क़श्ती साहिल साग़र बज़्म अहबाब हसरत हासिल शायरी

 
11111
एक़ लम्हेक़ी तवज़्ज़ोह नहीं,
हासिल उसक़ी…
और ये दिल क़ि,
उसे हदसे सिवा चाहता हैं…!
                                           परवीन शाक़िर

11112
क़ोई हासिल न था आरज़ूक़ा मग़र,
सानेहा ये हैं अब आरज़ूभी नहीं…
वक़्तक़ी इस मसाफ़तमें बे-आरज़ू,
तुम क़हाँ ज़ाओग़े हम क़हाँ ज़ाएँग़े…
जौन एलिया

11113
इस इश्क़पें हमभी हँसते थे,
बे-हासिल सा बे-हासिल था l
इक़ ज़ोर बिफ़रते साग़रमें,
ना क़श्ती थी ना साहिल था ll
                                             इब्न-ए-इंशा

11114
बज़्म-ए-अहबाबमें,
हासिल न हुआ चैन मुझे…
मुतमइन दिल हैं बहुत,
ज़बसे अलग़ बैठा हूँ …!
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर ग़ीलानी

11115
दिलसे हवा-ए-क़िश्त-ए-वफ़ा मिट ग़ई क़ि वाँ…
हासिल सिवाए हसरत-ए-हासिल नहीं रहा……
                                                                               मिर्ज़ा ग़ालिब

20 July 2026

11106 - 11110 दिल इश्क़ सरज़मीं फ़ासले मुरझा खौफ़ सिसक़ वस्ल बिछड़ तड़प ख़्वाब रुस्वा तन्हा हासिल शायरी

 
11106
क़हाँ दूर हटक़े ज़ायें,
हम दिलक़ी सरज़मींसे,
दोनों ज़हांक़ी सैरें,
हासिल हैं सब यहींसे।
                               ज़िग़र मुरादाबादी

11107
फ़ासले रख़क़े,
क़्या हासिल क़र लियाँ तूमने…?
रहते तो आज़भी,
मेरे दिलमें हीं हो……!

11108
मेरे लिए तुम,
ख़ुदा हीं तो हो…
न वो हासिल...
न तुम हासिल......

11109
फ़ूलोंक़ो मुरझानेक़ा ख़ौफ़ होता हैं…
तू शूल बन और ख़ुदहीं सिसक़क़र देख़ l
वस्ल हीं हासिल नहीं हैं इश्क़क़ा,
बिछड़क़र देख़, तड़पक़र देख़...ll

11110
ख़्वाबोंकी मंज़िल रुस्वाई ;
ख़्वाबोंका हासिल तन्हाई …!
                                          मोहसिन नक़वी

19 July 2026

11101 - 11105 दिल दुनियाँ ग़म याद क़लेज़ा आराम लब ग़ुल क़रार तड़प शायरी

 
11101
फ़िर क़िसीक़ी यादने तड़पा दिया,
फ़िर क़लेज़ा थामक़र हम रह ग़ए…!
                                                               फ़ानी बदायुनी

11102
तड़प ऐ दिल तड़पनेसे,
ज़रा आराम आता हैं l
कि लबपर हर तड़पक़े साथ,
उनका नाम आता हैं...!!!

11103
ग़ुलोंक़े सायेमें अक़्सर ‘रियाँज़’ तड़पा हूँ,
क़रार कांटोपै क़ुछ ऐसा पा लिया मैने।
                                                             ‘रियाँज़’ श्यामनग़री

11104
ख़ुद भी तड़प रहे हो,
और मुझे भी तड़पा रहे हो…
ऐसा क़्यों क़र रहे हो……? 

11105
इक़ ऐसी बहिश्त आई,
वादीमें पहुँच ज़ाएँ l
ज़िसमें क़भी दुनियाँक़े ग़म,
दिलक़ो न तड़पाएँ ll
                            अख़्तर शीरानी

18 July 2026

11096 - 11100 ज़िंदग़ी इश्क़ क़ातिल घुटन उदासी अश्क़ रुस्वाई क़हानी रस्म ज़ालिम अदा इज़ाज़त फ़रियाद तड़प शायरी

 
11096
घुटन तड़पन उदासी,
अश्क़ रुस्वाई अक़ेलापन…
बग़ैर इनक़े अधूरी इश्क़क़ी,
हर इक़ क़हानी हैं……
नीरज़ ग़ोस्वामी

11097
नया बिस्मिल हूँ मैं,
वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादतसे…
बता दे तू ही ऐ ज़ालिम,
तड़पनेक़ी अदा क़्या हैं
चक़बस्त बृज़ नारायण

11098
सिख़लाई फ़रिश्तोंक़ों,
आदमक़ी तड़प उसने…
आदमक़ो सिख़ाता हैं,
आदाब-ए-ख़ुदावंदी……
                                  अल्लामा इक़बाल

11099
ये सच हैं चंद लम्होंक़े लिए,
बिस्मिल तड़पता हैं l
फ़िर इसक़े बअ'द,
सारी ज़िंदग़ी क़ातिल तड़पता हैं…ll
ख़ुशबीर सिंह शाद

11100
न तड़पनेक़ी इज़ाज़त हैं,
न फ़रियादक़ी हैं…
घुटक़े मर ज़ाऊँ, ये मर्ज़ी…
मिरे सय्यादक़ी हैं
                                        शाद लख़नवी

17 July 2026

11091 -11095 दिल तसव्वुर नक़्शा चमन क़ली ख़मोशि निक़ाल क़रार सीने तौर मंज़िल शौक़ लग़न तड़पा शायरी

 
11091
रातभर उनक़ा तसव्वुर,
दिलक़ो तड़पाता रहा ;
एक़ नक़्शा सामने,
आता रहा, ज़ाता रहा

                                अख़्तर शीरानी

11092
चमनसे क़ौन चला हैं,
ख़मोशियाँ लेक़र
क़ली क़ली तड़प उट्ठी हैं ll
सिसक़ियाँ लेक़र

11093
तड़पने फड़क़नेक़ी तौफ़ीक़ दे,
दिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ दे……

                                                       अल्लामा इक़बाल

11094
ख़टक़ रही हैं क़ोई,
शय निक़ाल दे क़ोई……
तड़प रहा हैं,
दिल-ए-बे-क़रार सीनेमें ll
मुबारक़ अज़ीमाबादी

11095
तड़पा हैं इसी तौरसे,
दिल उसक़ी लग़नमें l
ढूँड़ी हैं यूँही शौक़ने,
आसाइश-ए-मंज़िल ll

                           फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

16 July 2026

11086 - 11090 दिल मोहब्बत नावक़-ए-ज़फ़ा ग़म निग़ाह अंज़ाम क़िस्मत सुब्ह शाम सितम याद ग़ैर तड़प शायरी

 
11086
तड़प रहा हैं दिल,
इक़ नावक़-ए-ज़फ़ाक़े लिए…
उसी निग़ाहसे फ़िर देख़िए,
ख़ुदाक़े लिए……
                                  लाला माधव राम ज़ौहर

11087
तुम्हें दिललग़ी भूल ज़ानी पड़ेग़ी,
मोहब्बतक़ी राहोंमें आक़र…
तो देख़ो तड़पनेपें मेरे,
न फ़िर तुम हँसोग़े क़भी,
दिल क़िसीसे लग़ाक़र तो देख़ो ll
पुरनम इलाहाबादी

11088
क़भी तड़पा ग़या हैं दिल तिरा ग़म,
क़भी दिलक़ो सहारा दे ग़या हैं ll
                                                  फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी

11089
मोहब्बत क़रनेवालोंक़ा,
यहीं अंज़ाम होता हैं l
तड़पना उनक़ी क़िस्मतमें तो,
सुब्ह-ओ-शाम होता हैं ll
राज़ा मेहदी अली ख़ाँ

11090
उनक़ो भूले हुए,
अपने ही सितम याद आए…
ज़ब क़िसी ग़ैरने तड़पाया,
तो हम याद आए……!
                                         सुदर्शन फ़ाक़िर

12 July 2026

11081 - 11085 दिल ज़िंदग़ी मलाल यार शर्त फ़रियाद नक़ाब अरमाँ बिज़ली पाक़ीज़ नफ़स क़रवट तड़प शायरी

 
11081
निग़ह-ए-यार,
ख़ुद तड़प उठती…
शर्त-ए-अव्वल,
ख़राब होना था……
                         ज़िग़र मुरादाबादी

11082
मेरी फ़रियादसे वो तड़प ज़ाएँग़े,
मेरे दिलक़ो मलाल इसक़ा होग़ा…?
मग़र क़्या ये क़म हैं क़ि,
वो बे-नक़ाब आएँग़े…
मरनेवालेक़ा अरमाँ,
निक़ल ज़ाएग़ा……
 अनवर मिर्ज़ापुरी

11083
तड़प बिज़लीसे पाई,
हूरसे पाक़ीज़ग़ी पाई……
हरारत ली,
नफ़स-हा-ए-मसीह-ए-इब्न-ए-मरयमसे !
                                                              अल्लामा इक़बाल

11084
क़भी हमभी तड़पमें बिज़ली थे,
अब तो क़रवटभी ली नहीं ज़ाती…
ज़लील मानिक़पूरी

11085
ये ज़मीं क़िस क़दर सज़ाई ग़ई,
ज़िंदग़ीक़ी तड़प बढ़ाई ग़ई……
                                              साहिर लुधियानवी

11 July 2026

11076 -11080 दिल बेक़रार ख़टक़ फ़ित्ना इख़्तियार चश्म-ए-निग़राँ ज़ल्वे अंज़ाम बेताब तड़प शायरी

 
11076
ख़टक़ रहीं हैं क़ोई,
शय निक़ाल दे क़ोई l
तड़प रहा हैं,
दिल-ए-बे-क़रार सीनेमें…ll
                                       मुबारक़ अज़ीमाबादी

11077
निक़ले मिरी बग़लसे,
वो ऐसे तड़पक़े साथ…
याँद आ ग़याँ मुझे,
वहीं बे-इख़्तियाँर दिल……
दाग़ देहलवी

11078
ज़ल्वे बेताब थे,
ज़ो पर्दा-ए-फ़ितरतमें 'ज़िग़र'…
ख़ुद तड़पक़र मिरी,
चश्म-ए-निग़राँ तक़ पहुँचे……
                                               ज़िग़र मुरादाबादी

11079
सितम तो ये हैं क़ि,
अंज़ाम बनक़े आए हैं…
हमारे दिलक़ी तड़प,
आज़ क़ुछ तो क़ाम आए……
तस्लीम फ़ाज़ली

11080
ज़हाँ भी था क़ोई फ़ित्ना,
तड़पक़े ज़ाग़ उठा…
तमाम होश थी,
मस्तीमें तेरी अंग़ड़ाई……!
                                       नासिर क़ाज़मी