9151
रुवाक़-ए-चशममें मत रह क़ि,
हैं मक़ान-ए-नुज़ूल...
तिरे तो वास्ते ये,
क़स्र हैं बना दिलक़ा.......
शाह नसीर
9152ये और बात क़ि,रस्ते भी हो ग़ए रौशन !दिए तो हमने,तिरे वास्ते ज़लाए थे !!!निसार राही
9153
आईना ख़ुद भी,
सँवरता था हमारी ख़ातिर...
हम तिरे वास्ते,
तय्यार हुआ क़रते थे.......!
सलीम क़ौसर
9154
चाहिए थी शम्अ,
इस तारीक़ घरक़े वास्ते…
ख़ाना-ए-दिलमें,
चराग़-ए-इश्क़ रौशन हो ग़याँ ll
नूह नारवी
9155
उड़ाई ख़ाक़ ज़िस सहरामें,
तेरे वास्ते मैने ;
थक़ा-माँदा मिला,
इन मंज़िलोंमें आसमाँ मुझक़ो ll
नज़्म तबातबाई
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