27 July 2017

1571 - 1575 दिल मोहब्बत आरजू गुनाह सजा ज़हर दुश्मन खफा सितम खौफ सब्र आँख बेखबर अल्फ़ाज़ चुभते ख़ामोशी शायरी


1571
"गुनाह करके सजासे डरते हैं,
ज़हर पीके दवासे डरते हैं . . .
दुश्मनोंके सितमका खौफ नहीं हमे,
हम तो दोस्तोंके खफा होनेसे डरते हैं !!!"

1572
माना क़ी हमारे,
अल्फ़ाज़ चुभते हैं…
पर आपक़ी ख़ामोशी तो,
मार हीं देती हैं…

1573
रात तकती रही आँखोमें,
दिल आरजू करता रहा...,
कोई बेसब्र रोता रहा,
कोई बेखबर सोता रहा...

1574
आज मिलते ही उसने...
मेरा नाम पूछ लिया...
बिछड़ते वक्त जिसने कहा था,
तुम बहुत याद आओगे।

1575
क्यूँ कर रहे हो भला,
तुम बगावत खुदसे...
मान क्यों नहीं लेते की;
तुम्हे भी हैं मोहब्बत मुझसे !!!

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