21 July 2017

1551 - 1555 इश्क मोहब्बत जल क़रीब क़मीज़ तस्वीर इत्र होश शौक वजूद टुकडे शायरी


1551
गीली लकड़ीसा इश्क,
उन्होंने सुलगाया हैं...
ना पूरा जल पाया कभी,
ना बुझ पाया हैं...!!!

1552
तस्वीर तेरी क़मीज़क़ी ज़ैबमें,
ज़बसे हम रख़ने लग़े हैं,
क़रीबसे ग़ुज़रता हर शख़्स पूछता हैं क़ी,
क़ौनसा इत्र हैं ज़नाब......!

1553
बहुत शौक था;
सबको जोडके रखनेका...
होश तब आया जब,
अपने वजूदके टुकडे देखे.......

1554
बड़ा अजीब होता हैं,
ये मोहब्बत हैं खेल भी,
एक थक जाये तो,
दोनों हार जाते हैं...!

1555
वो करीब बहुत हैं,
मगर कुछ दूरियोंके साथ...,
हम दोनों जी तो रहे हैं,
पर बहुतसी मजबूरीयोंके साथ.......

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