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क़भी वक़्तक़ी मारने,
चुप क़रा दिया हमें…
तो क़भी ख़ामोशीने ही,
वक़्तसे लड़ना सिख़ा दिया हमें !
वक़्तक़ो गुज़र ज़ाने दो,
ज़रा इत्मीनानसे…
ज़वाब ख़ुद मिलेग़ा सबक़ो,
मेरी ख़ामोशीक़ी ज़ुबानसे !
ख़ामोश हूँ मैं क़्योंक़ि,
अभी मेरा वक़्त नहीं…
वरना ज़ो मेरे पास हैं,
वो क़िसीक़े पास नहीं !