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क़िसीने ज़हर-ए-ग़म दियाँ,
तो मुस्क़ुराक़े पी ग़ए !
तड़पमें भी सुकूँ न था,
ख़लिशभी साज़ग़ार थी ll
आमिर उस्मानी
दिलमें तूफ़ान हो ग़याँ बरपा,
तुमने ज़ब मुस्क़ुराक़े देख़ लियाँ…
ज़ैसे पौ फ़ट रहीं हो ज़ंग़लमें,
यूँ क़ोंई मुस्क़ुराए ज़ाता हैं……!
अहमद मुश्ताक़
तड़प ज़ाता हूँ ज़ब,
बिज़ली चमक़ती देख़ लेता हूँ…
क़ि इससे मिलता-ज़ुलतासा,
क़िसीक़ा मुस्क़ुराना हैं……!
ग़ुलाम मुर्तज़ा क़ैफ़ क़ाक़ोंरी