1 May 2018

2676 - 2680 दिल महबूब क़हानि नींद रात दर्द ग़ुज़र इंतजार खुश फिक्र इत्तेफाक गम महफ़िल कमाल शायरी


2676
क़हानियोंक़ी ग़ुज़रग़ाहपरभी,
नींद नहीं ;
ये रात क़ैसी हैं
ये दर्द ज़ाग़ता क्यूँ हैं ll

2677
इंतजारकी घड़ियाँ,
ख़त्म कर खुदा...
जिसके लिये बनाया हैं,
उससे मिलवा भी दे अब ज़रा...!!!

2678
वो लाख तुझे पूजती होगी ,
मगर तू खुश हो खुदा ,
वो मंदिर भी जाती हैं तो...
मेरी गलीसे गुजरनेके लिये...!

2679
ना हैं जिसे मेरी फिक्र,
इत्तेफाकसे उसीको चाह रहे हैं हम;
उसी दियेने जलाया हाथोंको,
जिसे हवासे बचा रहे थे हम...

2680
शायरोंकी बस्तीमें कदम रखा
तो जाना.......
गमोंकी महफ़िल भी
कमालकी जमती हैं.......!

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