6171
कहा मैंने गुलका हैं,
कितना सबात...
कलीने ये सुनकर,
तबस्सुम किया...
मीर तक़ी मीर
6172
मेरे लबोंका तबस्सुम तो,
सबने देख लिया...
जो दिलपें बीत रही
हैं,
वो कोई क्या
जाने.......
6173
इक तबस्सुम,
हजार शिकवोंका...
कितना प्यारा,
जवाब होता हैं...!
6174
ऐसे इक़रारमें इंकारके,
सौ पहलू हैं...
वो तो कहिए
कि,
लबोंपें
न तबस्सुम आए...!
6175
हर मुसीबतका दिया,
इक तबस्सुमसे जवाब...
इस तरहसे गर्दिशे-दौरांको,
रूलाया मैंने.......
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