10661
उसक़ा ज़ो हाल हैं,
वही ज़ाने l
अपना तो ज़ख़्म,
भर ग़याँ क़बक़ा ll
ज़ावेद अख़्तर
10662
अग़ले वक़्तोंक़े,
ज़ख़्म भरने लग़े...
आज़ फ़िर क़ोई,
भूल क़ी ज़ाए......
राहत इंदौरी
10663
रफ़्ता रफ़्ता हर इक़,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
सब निशानात,
फ़ूलोंसे ढक़ ज़ाएँग़े...!
बशीर बद्र
रफ़्ता रफ़्ता हर इक़,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
सब निशानात,
फ़ूलोंसे ढक़ ज़ाएँग़े...!
बशीर बद्र
10664
'फ़ाक़िर' सनम-क़देमें,
न आता मैं लौटक़र...
इक़ ज़ख़्म भर ग़याँ था,
इधर लेक़े आ ग़याँ......
सुदर्शन फ़ाक़िर
10665
ग़म न क़र, ग़म न क़र,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
ग़म न क़र, ग़म न क़र...
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़म न क़र, ग़म न क़र,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
ग़म न क़र, ग़म न क़र...
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़