7 April 2026

10661 - 10665 फ़ूल निशान रफ़्ता हाल भूल सनम वक़्त ग़म लौट ज़ख़्म शायरी

 
10661
उसक़ा ज़ो हाल हैं,
वही ज़ाने l
अपना तो ज़ख़्म,
भर ग़याँ क़बक़ा ll
                     ज़ावेद अख़्तर

10662
अग़ले वक़्तोंक़े,
ज़ख़्म भरने लग़े...
आज़ फ़िर क़ोई,
भूल क़ी ज़ाए......
                         राहत इंदौरी

10663
रफ़्ता रफ़्ता हर इक़,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
सब निशानात,
फ़ूलोंसे ढक़ ज़ाएँग़े...!
                                  बशीर बद्र

10664
'फ़ाक़िर' सनम-क़देमें,
न आता मैं लौटक़र...
इक़ ज़ख़्म भर ग़याँ था,
इधर लेक़े आ ग़याँ......
                                सुदर्शन फ़ाक़िर

10665
ग़म न क़र, ग़म न क़र,
ज़ख़्म भर ज़ाएग़ा...
ग़म न क़र, ग़म न क़र...
                                  फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

6 April 2026

10656 - 10660 दिल हाथ धोक़ा चालाक़ बयाज़ लग़ा रसाई दुश्मन आज़मा ज़ख़्म शायरी


10656
ज़ख़्म लग़ाक़र उसक़ा भी,
क़ुछ हाथ ख़ुला l
मैं भी धोक़ा ख़ाक़र,
क़ुछ चालाक़ हुआ…
                                          ज़ेब ग़ौरी

10657
यूँ ही इक़ ज़ख़्मपर,
दे दी थी इस्लाह…
सो अब लेक़र,
बयाज़ आने लग़ा हैं
फ़रहत एहसास

10658
इस बार हूँ दुश्मनक़ी,
रसाईसे बहुत दूर…
इस बार मग़र,
ज़ख़्म लग़ाएग़ा क़ोई और…
                                        आनिस मुईन

10659
क़्या क़रे मेरी,
मसीहाईभी क़रनेवाला
ज़ख़्म ही ये मुझे,
लग़ता नहीं भरनेवाला…
परवीन शाक़िर

10660
हाथ ही तेग़-आज़माक़ा,
क़ामसे ज़ाता रहा…
दिलपें इक़ लग़ने न पायाँ,
ज़ख़्म-ए-क़ारी हाए हाए…
                                       मिर्ज़ा ग़ालिब

5 April 2026

10651 - 10655 दिलासे ग़हरा रूह सोच याँद दरियाँ ग़हराई फ़ुर्सत उदास क़सक़ दिल आँख़ ज़ख़्म शायरी

 
10651
लोग़ देते रहें,
क़्या क़्या न दिलासे मुझक़ो
ज़ख़्म ग़हरा ही सही,
ज़ख़्म हैं भर ज़ाएग़ा……
                                        शक़ेब ज़लाली

10652
आपक़ी आँख़से ग़हरा हैं,
मिरी रूहक़ा ज़ख़्म…
आप क़्या सोच सकेंग़े,
मिरी क़ो
मोहसिन नक़वी

10653
ये मसीहाई,
उसे भूल ग़ई हैं 'मोहसिन'
याँ फ़िर ऐसा हैं,
मिरा ज़ख़्म ही ग़हरा होग़ा…
                                         मोहसिन नक़वी

10654
क़िसने देख़ें हैं,
तिरी रूहक़े रिसते हुए ज़ख़्म…
क़ौन उतरा हैं,
तिरे क़ल्ब क़ी ग़हराईमें
रईस अमरोहवी

10655
न अब वो याँदोंक़ा चढ़ता दरियाँ,
न फ़ुर्सतोंक़ी उदास बरख़ा…
यूँही ज़रासी क़सक़ हैं दिलमें,
ज़ो ज़ख़्म ग़हरा था भर ग़याँ वो ll
                                                  नासिर क़ाज़मी

4 April 2026

10646 - 10650 दिल निग़ार-ख़ाने ख़ूबसूरत बिछड़ा जिस्म अबरू ज़ख़्म शायरी

 
10646
देख़ दिलक़े निग़ार-ख़ानेमें,
ज़ख़्म-ए-पिन्हाँक़ी हैं निशानी भी…
फ़िराक़ गोरख़पुरी

10647
अब तो ये आरज़ू हैं क़ि,
वो ज़ख़्म ख़ाइए…
ता-ज़िंदग़ी ये दिल,
न क़ोई आरज़ू क़रे
अहमद फ़राज़

10648
ज़ख़्म आँख़ोंक़े भी सहते थे,
क़भी दिलवाले…
अब तो अबरूक़ा इशारा,
नहीं देख़ा ज़ाता……
                                         मोहसिन नक़वी

10649
बिछड़ा हैं ज़ो इक़ बार,
तो मिलते नहीं देख़ा…
इस ज़ख़्मक़ो हमने,
क़भी सिलते नहीं देख़ा…
परवीन शाक़िर

10650
अभी हम ख़ूबसूरत हैं,
हमारे जिस्म औराक़-ए-ख़िज़ानी हो गए हैं l
और रिदा-ए-ज़ख़्म से आरास्ता हैं ll
फ़िर भी देख़ो तो
हमारी ख़ुश-नुमाईपर कोई हर्फ़,
और कशीदा-कामतीमें ख़म नहीं आया…
अहमद फ़राज़

3 April 2026

10641 - 10645 दिल नज़र अश्क़ चूम दस्त ज़िग़र नींद ख़्वाब वहशत आफ़त ज़ौहर सर देख़ ज़ख़्म शायरी

 

10641
हर एक़ ज़ख़्मक़ो,
अश्क़ोंसे धोक़े चूम लिया;
मैं ऐसे ठीक़ हुआ,
उसक़ी देख़-भालक़े बाद…!
                                              वरुन आनन्द

10642
नज़र लग़े न क़हीं उसक़े,
दस्त-ओ-बाज़ूक़ो…
ये लोग़ क़्यूँ मिरे,
ज़ख़्म-ए-ज़िग़रक़ो देख़ते हैं…?
मिर्ज़ा ग़ालिब

10643
नींद पिछली सदीक़ी ज़ख़्मी हैं;
ख़्वाब अग़ली सदीक़े देख़ते हैं ll
                                                   राहत इंदौरी

10644
वहशत-ए-ज़ख़्म-ए-वफ़ा,
देख़ क़ि सर-ता-सर दिल…
बख़ियाँ जूँ ज़ौहर-ए-तेग़,
आफ़त-ए-ग़ीराई हैं…ll
मिर्ज़ा ग़ालिब

10645
रुत बदलने लग़ी,
रंग़-ए-दिल देख़ना,
रंग़-ए-ग़ुलशनसे अब,
हाल ख़ुलता नहीं l
ज़ख़्म छलक़ा क़ोई,
याँ क़ोई ग़ुल ख़िला…
अश्क़ उमडे क़ि,
अब्र-ए-बहार आ ग़या…
                              फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

2 April 2026

10636 - 10640 दिल मोहब्बत दुश्मन दीवाना उमीद चेहरा निशा नज़र हिज़्र वस्ल दिख़ा ज़ख़्म शायरी

 
10636
क़्या क़्या न उसक़ो,
ज़ोम-ए-मसीहाई था 'उमीद'…
हमने दिख़ाए ज़ख़्म तो,
चेहरा उतर ग़याँ……
                                         उम्मीद फ़ाज़ली

10637
निशान-ए-हिज़्र भी हैं,
वस्लक़ी निशानियोंमें…
क़हाँक़ा ज़ख़्म,
क़हाँपर दिख़ाई देने लग़ा……
शाहीन अब्बास

10638
ये मिरा दिल, मिरा दुश्मन,
मिरा दीवाना दिल…
चाहता हैं क़ि,
सभी ज़ख़्म दिख़ाऊँ उसक़ो......
                                             शहज़ाद अहमद

10639
हिज़्र ऐसा हो क़ि,
चेहरेपें नज़र आ ज़ाए...
ज़ख़्म ऐसा हो क़ि,
दिख़ ज़ाए दिख़ाना न पड़े......
उमैर नज़मी

10340
ये मो'ज़िज़ा भी,
मोहब्बत क़भी दिख़ाए मुझे...
क़ि संग़ तुझपें ग़िरे और,
ज़ख़्म आए मुझे......
                                    क़तील शिफ़ाई

1 April 2026

10631 - 10635 दिल तमन्ना ग़ली नक़्श मेहरबाँ आँखें चाँद सितारा नग़्मा वादा साँस लौ ज़ख़्म शायरी

 
10631
हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना,
पुराने हो ग़ए हैं…
क़ि उस ग़लीमें ग़ए अब,
ज़माने हो ग़ए हैं……
                                    ज़ौन एलिया

10632
हर एक़ नक़्श तमन्नाक़ा,
हो ग़या धुंदला…
हर एक़ ज़ख़्म मिरे दिलक़ा,
भर ग़या याँरो……
शहरयाँर

10633
मेहरबाँ हैं तिरी आँखें,
मग़र ऐ मूनिस-ए-ज़ाँ…
इनसे हर ज़ख़्म-ए-तमन्ना तो,
नहीं भर सक़ता……
                                            अहमद फ़राज़

10634
मैने चाँद और सितारोंक़ी,
तमन्ना क़ी थी…
ज़ख़्म-ए-नग़्मा भी लौ तो देता हैं,
इक़ दियाँ रह ग़याँ ज़लानेक़ो……
अदा ज़ाफ़री

10635
चाक़-ए-वादा न सिले,
ज़ख़्म-ए-तमन्ना न ख़िले…
साँस हमवार रहें,
शम्अक़ी लौ तक़ न हिले…
                                         मुस्तफ़ा ज़ैदी

31 March 2026

10626 - 10630 इलाज़ ग़हरे वक़्त तसव्वुर शिक़ायत भूल ज़राहत क़तरा महताब रात घाव दिल ज़ख़्म शायरी

 

10626
हमने इलाज़-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो,
ढूँड़ लियाँ लेक़िन…
ग़हरे ज़ख़्मोंक़ो भरनेमें,
वक़्त तो लग़ता हैं……
                                                हस्तीमल हस्ती

10627
न वो नशात-ए-तसव्वुर,
क़ि लो तुम आ ही ग़ए…
न ज़ख़्म-ए-दिलक़ी हैं सोज़िश,
क़ोई ज़ो सहनी हो……
ज़ौन एलियाँ

10628
वो फ़िर मोटरसे टक्करक़ी,
शिक़ायत भूल ज़ाएग़ी…
वो ज़ख़्म-ए-दिलक़े आग़े,
हर ज़राहत भूल ज़ाएग़ी……!
                                           ज़रीफ़ ज़बलपूरी

10629
ज़ख़्म-ए-दिलमें नहीं हैं,
क़तरा-ए-ख़ूँ…
ख़ूब हमने दिख़ाक़े,
देख़ लियाँ……
दाग़ देहलवी

10630
ये महताब ये रातक़ी,
पेंशानीक़ा घाव;
ऐसा ज़ख़्म तो दिलपर,
ख़ायाँ ज़ा सक़ता हैं ll
                             अब्बास ताबिश

30 March 2026

10621 - 10625 लुत्फ़ ख़ास तीर क़ब शौक़ रंग़ फ़स्ल दुआ बचपन अल्फ़ाज़ याँद ज़ख़्म शायरी

 
10621
ज़ख़्म दबे तो फ़िर,
नयाँ तीर चला दिया क़रो;
अपना लुत्फ़-ए-ख़ास,
याँद दिला दिया क़रो…ll
                                     पीरज़ादा क़ासिम

10622 
ज़ख़्म उभरते हैं,
ज़ाने क़ब क़बक़े;
ज़ाने क़िस क़िसक़ी,
याँद आती हैं…ll
फ़रहत एहसास

10623
शौक़क़ा रंग़ बुझ ग़याँ,
याँदक़े ज़ख़्म भर ग़ए;
क़्या मिरी फ़स्ल हो चुक़ी,
क़्या मिरे दिन ग़ुज़र ग़ए…?
                                        ज़ौन एलियाँ

10624
दुआएँ याँद क़रा दी ग़ई थीं,
बचपनमें…
सो ज़ख़्म ख़ाते रहें,
और दुआ दिए ग़ए हम…
इफ़्तिख़ार आरिफ़

10625 
क़ाश मैं ऐसी शायरी लिख़ूँ,
तेरी याँदमें,
तेरे दिये ज़ख़्म दिख़ाई दे,
मेरी हर अल्फ़ाज़में  !!!

29 March 2026

10616 - 10620 दिल ज़र्रे तवज्जो शम्स क़मर रात आँख़ अर्सा निशान शरीक़ दर्द ज़ख़्म शायरी

 
10616
ज़र्रेक़े ज़ख़्म दिलपें,
तवज्जोह क़िए बग़ैर...
दरमान-ए-दर्द-ए-शम्स-ओ-क़मर,
क़र रहें हैं हम...

                                                     रईस अमरोहवी


10617
रात छाई तो हर इक़,
दर्दक़े धारे छूटे…
सुब्ह फ़ूटी तो हर इक़,
ज़ख़्मक़े टाँक़े टूटे……
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

10618
क़्यूँ क़िसी औरक़ो,
दुख़ दर्द सुनाऊँ अपने…
अपनी आँख़ोंसे भी,
मैं ज़ख़्म छुपाऊँ अपने……
                                          अनवर मसूद

10619
वो ज़ख़्मभर ग़या, अर्सा हुआ,
मग़र अब तक़…
ज़रासा दर्द, ज़रासा निशान,
बाक़ी हैं……
ज़ावेद अख़्तर

10620
दिलपर ज़ो ज़ख़्म हैं,
वो दिख़ाएँ क़िसीक़ो क़्या…?
अपना शरीक़-ए-दर्द बनाएँ,
क़िसीक़ो क़्या……?
                                          हबीब ज़ालिब

28 March 2026

10611 - 10615 दुनियाँ क़याँमत होश ग़म दर्द अश्क़ दश्त छाले फ़ुग़ाँ तोहफ़े तमन्ना शादाब दाग़ ज़ख़्म शायरी

 
10611
उसक़े बाद अग़ली क़याँमत क़्या हैं,
क़िसक़ो होश हैं…
ज़ख़्म सहलाता था और,
अब दाग़ दिख़लाता हूँ मैं……
                                                   शाहीन अब्बास

10612 
क़भी तो यूँ भी उमँड़ते,
सरिश्क़-ए-ग़म 'मज़रूह';
क़ि मेरे ज़ख़्म-ए-तमन्नाक़े,
दाग़ धो देते…ll
मज़रूह सुल्तानपुरी

10613
क़ुछ ऐसे ज़ख़्म हैं,
ज़िनक़ो सभी शादाब लग़ते हैं l
क़ुछ ऐसे दाग़ हैं,
ज़िनक़ो क़भी धोयाँ नहीं ज़ाता…ll
                                                  आलम ख़ुर्शीद

10614
ज़ख़्म क़ैसे फ़लते हैं,
दाग़ क़ैसे ज़लते हैं,
दर्द क़ैसे होता हैं,
क़ोई क़ैसे रोता हैं
अश्क़ क़्या हैं,
नाले क़्या, दश्त क़्या हैं,
छाले क़्या, आह क़्या, फ़ुग़ाँ क़्या हैं,
तुम न ज़ान पाओग़े……
ज़ावेद अख़्तर

10615
दाग़ दुनियाँने दिए,
ज़ख़्म ज़मानेसे मिले;
हमक़ो तोहफ़े ये,
तुम्हें दोस्त बनानेसे मिले ll
                                        क़ैफ़ भोपाली

27 March 2026

10606 - 10610 दिल हुनर बहार दर्द बिख़र ख़बर रोज़ आसमाँ सुर्ख़ फ़ूल ज़ख़्म शायरी


10606
ज़ख़्मक़ा नाम फ़ूल क़ैसे पड़ा…
तेरे दस्त-ए-हुनरसे पूछते हैं !!!
                                                 राहत इंदौरी

10607
ये सुर्ख़ सुर्ख़ फ़ूल हैं,
क़ि ज़ख़्म हैं बहारक़े…
ये ओसक़ी फ़ुवार हैं,
क़ि रो रहा हैं आसमाँ…?
आमिर उस्मानी

10608
दर्दक़े फ़ूलभी ख़िलते हैं,
बिख़र ज़ाते हैं…
ज़ख़्म क़ैसेभी हो,
क़ुछ रोज़में भर ज़ाते हैं…ll
                                            ज़ावेद अख़्तर

10609
क़िसीक़ो ज़ख़्म दिए हैं,
क़िसीक़ो फ़ूल दिए…
बुरी हो चाहे भली हो,
मग़र ख़बरमें रहो ll
राहत इंदौरी

10610
क़र्या-ए-ज़ाँमें,
क़ोई फ़ूल ख़िलाने आए…
वो मिरे दिलपें,
नयाँ ज़ख़्म लग़ाने आए……
                                            परवीन शाक़िर

24 March 2026

10601 - 10605 दिल ज़हाँ तीर बात बुरा तलवार क़त्ल इरशाद इलज़ाम मर्ज़ी ग़िला ज़ख़्म शायरी

 
10601
आपने तीर लग़ायाँ,
तो क़ोई बात न थी…
ज़ख़्म मैंने ज़ो दिख़ायाँ,
तो बुरा मान ग़ए……
                             हमीद अज़ीमाबादी

10602
एक़ बात ज़ो मुझे,
सारे ज़हाँक़े सामने रख़नी हैं,
ठीक़ हैं कौन यहाँ ज़ब,
सभीक़े दिल ज़ख़्मी हैं।

10603
बातक़ा ज़ख़्म हैं,
तलवारक़े ज़ख़्मोंसे सिवा…
क़ीज़िए क़त्ल मग़र,
मुँहसे क़ुछ इरशाद न हो……
                                                दाग़ देहलवी

10604
रुक़ते नहीं हम भी ढीट,
बस चलते रहते हैं,
इलज़ाम और ज़ख़्म भले,
ज़ितने मर्ज़ी लग़ते रहते हैं।

10605
ये और बात हैं,
तुझसे ग़िला नहीं क़रते…
ज़ो ज़ख़्म तूने दिए हैं,
भरा नहीं क़रते……
                      अमज़द इस्लाम अमज़द

23 March 2026

10596 - 10600 दिल पेशा आन सच्चे बच्चे ग़म दर्द अंज़ाम इनाम फ़ूल हँसी पाग़ल लम्स ज़ादू ज़ख़्म शायरी


10596
दिलक़े सब ज़ख़्म,
पेशावर हैं मियाँ;
आन हा आन,
भरते रहते हैं…
                      ज़ौन एलियाँ

10597
ज़ब सच्चे दिलवालोंक़े,
होते बुरे अंज़ाम देख़ें हैं…
ज़ख़्म, ग़म, दर्द, सच्चाईक़ो,
मिलते इनाम देख़ें हैं …ll

10598
हो ग़ए फ़ूल ज़ख़्म-ए-दिल,
ख़िलक़र नहीं ज़ाती,
हँसी नहीं ज़ाती ll
                             ज़लील मानिक़पूरी

10599
इतने ज़ख़्म भी अच्छे नहीं,
हम भी अब बच्चे नहीं l
क़ितना सहे एक़ पाग़ल आदमी भला,
हम झूठे तो तुम भी सच्चे नहीं ll

10600
वो ज़ख़्मक़ा दर्द हो
क़ि वो लम्सक़ा हो ज़ादू…
                                     ज़ावेद अख़्तर

22 March 2026

10591 - 10595 आँख़ बात तौर सफ़र ज़िन्दग़ी दुनियाँ मोड़ सबक़ नमक़ रंग़ क़मान ख़ुश्बू तीर मरहम ज़ख़्म शायरी


10591 
ज़ख़्म तो हमने,
इन आँख़ोंसे देख़े हैं…
लोग़ोंसे सुनते हैं,
मरहम होता हैं ll
                           ज़ावेद अख़्तर

10592
ज़ख़्म हर ज़ग़ह हैं,
क़हीं मरहम नहीं मिलता,
मैं-मैंक़ी रट हर ज़ग़ह हैं,
मग़र क़हीं हम नहीं मिलता। 

10593
बात बे-तौर हो ग़ई शायद…
ज़ख़्मभी अब नहीं हैं, मरहमज़ी…
                                                     ज़ौन एलियाँ

10594
ये सफ़र-ऐ-ज़िन्दग़ी हैं,
यहाँ हर मोड़पर सबक़ हैं,
ये दुनियाँ दिख़ाती मरहम हैं,
लग़ाती नमक़ हैं।

10595
इक़ रंग़सी क़मान हो,
ख़ुश्बूसा एक़ तीर…
मरहमसी वारदात हो,
और ज़ख़्म ख़ाऊँ मैं…
                                ज़ौन एलियाँ

21 March 2026

10586 - 10590 बाग़्बान बहार तदबीर वक़्त हक़ीम घाव दवा दर्द फ़ुर्क़त उम्मीद हौसले मरहम ज़ख़्म शायरी


10586
बाग़्बान-ए-चारा-फ़र्मासे,
ये क़हती हैं बहार
ज़ख़्म-ए-ग़ुलक़े वास्ते,
तदबीर-ए-मरहम क़ब तलक़?

                                              अल्लामा इक़बाल

10587
वक़्तक़े पास,
हर घावक़ी दवा हैं,
सच! वक़्तसे बड़ा,
क़ोई हक़ीम नहीं हैं।

10588
क़हते हैं अहल-ए-ज़हाँ,
दर्द-ए-अज़ल हैं ला-दवा
ज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त,
वक़्तक़े मरहमसे पाता हैं शिफ़ा !

                                               अल्लामा इक़बाल

10589
ख़ुशियाँ क़म हैं, ग़म क़म नहीं,
दवाएँ क़म हैं, ज़ख़्म क़म नहीं।

10590
तुम हमारे हौसलेक़ी,
आख़िरी उम्मीद हो
तुम हमारे ज़ख़्मपर,
मरहम लग़ायाँ मत क़रो……!

                                        अबरार अहमद क़ाशिफ़

20 March 2026

10581 - 10585 दिल चाराग़र क़ाफ़ूर शर्मिंदा मरहम नश्तर दस्त ग़ैर समझ लज़्ज़त दवा सोज़न ज़ख़्म शायरी


10581
चाराग़र यूँ तो बहुत हैं,
मग़र ऐ ज़ान-ए-'फ़राज़'…
ज़ुज़ तिरे और क़ोई,
ज़ख़्म न ज़ाने मेरे……
                                  अहमद फ़राज़

10582
ज़ो रक़्ख़े चाराग़र क़ाफ़ूर दूनी,
आग़ लग़ ज़ाए…
क़हीं ये ज़ख़्म-ए-दिल,
शर्मिंदा-ए-मरहम भी होते हैं ll
दाग़ देहलवी

10583
नश्तर-ब-दस्त शहरसे,
चाराग़रीक़ी लौ…
ऐ ज़ख़्म-ए-बे-क़सी,
तुझे भर ज़ाना चाहिए…
                                   परवीन शाक़िर

10584
ज़ख़्म सिलवानेसे,
मुझपर चारा-ज़ुईक़ा हैं तान…
ग़ैर समझा हैं क़ि लज़्ज़त,
ज़ख़्म-ए-सोज़नमें नहीं……
मिर्ज़ा ग़ालिब

10585
एक़ ये ज़ख़्म ही क़ाफ़ी हैं,
मिरे ज़ीनेक़ो…
चाराग़र ठीक़ न होनेक़ी,
दवा दे मुझक़ो ll
                                       बालमोहन पांडेय

19 March 2026

10576 - 10580 दिल चेहरे लहू ख़ुश्बू पुरवाई सोच दुख़ बहार सहारा दम हाथ पढ़ हँस ज़िग़र मनाज़िर ज़ख़्म शायरी

 
10576
मस्त क़रती हैं मुझे,
अपने लहूक़ी ख़ुश्बू…
ज़ख़्म सब ख़ोलक़े,
पुरवाई चली ज़ाती हैं ll
                            शक़ील आज़मी

10577
ज़ख़्म ज़ो मेरे दिख़ते नहीं,
वो सोचते हैं… दुख़ते नहीं।

10578
क़ुछ अपने दिलपर भी ज़ख़्म ख़ाओ,
मिरे लहूक़ी बहार क़ब तक़
मुझे सहारा बनानेवालो,
मैं लड़ख़ड़ाया तो क़्या क़रोग़े...?
                                                       क़ाबिल अज़मेरी

10579
पढ़ पढ़क़े वो दम क़रते हैं,
क़ुछ हाथपर अपने…
हँस हँसक़े मिरे,
ज़ख़्म-ए-ज़िग़र देख़ रहें हैं……

10580
ये ज़ख़्म ज़ख़्म मनाज़िर,
लहू लहू चेहरे…
क़हाँ चले ग़ए वो लोग़,
हँसते ग़ाते हुए……
                                 अज़हर इक़बाल

18 March 2026

10571 - 10575 फ़राहम ख़ज़ाना हुनर सीख़ दर्द रिफ़ाक़त ज़माने तरस वाख़िफ़ बात ज़हर ज़ख़्म शायरी


10571
क़रता रहता हूँ फ़राहम मैं,
ज़र-ए-ज़ख़्म क़ि यूँ…
शायद आइंदा ज़मानोंक़ा,
ख़ज़ाना बन ज़ाए……
                                     अहमद फ़राज़
10572
बस हुनर सीख़ लिया था,
ज़ख़्मोंक़ो छुपानेक़ा,
लोग़ क़हने लग़े…
तुझे तो क़ोई दर्द ही नहीं हैं।

10573
क़्यूँ न हम अहद-ए-रिफ़ाक़तक़ो,
भुलाने लग़ ज़ाएँ…
शायद इस ज़ख़्मक़ो भरनेमें,
ज़माने लग़ ज़ाएँ……
                                                अहमद फ़राज़
10574
ज़ख़्म ज़मानेक़ो दिख़ाक़र,
हासिल भी क़्या होग़ा?
सब तरस ख़ाएंग़े,
क़ोई इस दर्दसे वाख़िफ़ भी क़्या होग़ा?

10575
हर एक़ बात,
न क़्यूँ ज़हरसी हमारी लग़े…?
क़ि हमक़ो दस्त-ए-ज़मानासे,
ज़ख़्मक़ारी लग़े……
                                              अहमद फ़राज़

17 March 2026

10566 - 10570 मोहोब्बत फ़ूल ज़ीस्त बदनाम इलज़ाम क़िस्मत वज़ह तड़प ज़ालिम नमक़ वर्ज़िश ज़ख़्म शायरी

 
10566
ज़ो ज़ख़्म बाँटते हैं,
उन्हें ज़ीस्तपें हैं हक़;
मैं फ़ूल बाँटता हूँ,
मुझे मार दिज़िए……
                            अहमद फ़रहाद

10567
तू बदनाम ना हो,
बस इसी वज़हसे…
इन ज़ख़्मोंक़ा इलज़ाम मैने,
क़िस्मतपर डाल दिया।

10568
तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम,
तिरी दुहाई न दूँ…
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फ़िर भी…
तुझे दिख़ाई न दूँ ll
                                        अहमद फ़राज़

10569
ज़ख़्मोंक़ी सज़ा,
भले मिली हो मुझे…
पर मोहोब्बतक़ी अदालतमें,
बेक़सूर था मैं।

10570
नमक़क़ी रोज़,
मालिश क़र रहें हैं…
हमारे ज़ख़्म,
वर्ज़िश क़र रहें हैं…
                        फ़हमी बदायूनी

13 March 2026

10561- 10565 दिल एतिराफ़ निशान वफ़ा हाल सवाल ज़वाब सहल पराया सनम सिलसिले रुत दुख़ ज़ख़्म शायरी

 
10561
या ज़ख़्म-ए-दिलक़ो,
छीलक़े सीनेसे फ़ेंक़ दे…
या एतिराफ़ क़र क़ि,
निशान-ए-वफ़ा मिला…
                            सीमाब अक़बराबादी

10562
ज़ख़्म देक़र भी पूछती हैं…
हाल मेरा;
ज़वाब तो नहीं पास…
पर लाज़वाब हैं, ये सवाल तेरा।

10563
ज़ख़्म दिलक़े,
अग़र सिए होते…
अहल-ए-दिल,
क़िस तरह ज़िए होते……
                                  अब्दुल हमीद अदम

10564
ज़ख़्म तो क़र दिए,
अब भला सहलानेसे क़्या होग़ा,
पराया तो क़र चुक़े हो,
सनम, अब भला अपनानेसे क़्या होग़ा…

10565
नई रुतोंमें दुख़ोंक़ेभी,
सिलसिले हैं नए…
वो ज़ख़्म ताज़ा हुए हैं,
ज़ो भरनेवाले थे……
                           ज़माल एहसानी

12 March 2026

10556 - 10560 दिल मज़रूह हवा नज़र निशाँ बेहतर ग़ज़ल नमक़ क़ीमत सस्ती ग़हरा मिज़ाज़ ज़ख़्म शायरी

 
10556
क़िस नज़रसे आपने देख़ा,
दिल-ए-मज़रूहक़ो l
ज़ख़्म ज़ो क़ुछ भर चले थे,
फ़िर हवा देने लग़े ll
                                   साक़िब लख़नवी

10557
क़ुछ ज़ख़्म,
अंदरतक़ तोड़ ज़ाते हैं…
भर तो ज़ाते हैं पर…
निशाँ छोड़ ज़ाते हैं…!

10558
फ़ुलाँसे थी ग़ज़ल,
बेहतर फ़ुलाँक़ी…
फ़ुलाँक़े ज़ख़्म अच्छे थे,
फ़ुलाँसे……
                                  ज़ौन एलिया

10559
नमक़क़ी क़ीमत,
सस्ती हैं बहुत;
लोग़ ख़ाते क़ाम,
छिड़क़ते ज़्यादा हैं।

10560
इक़ ज़ख़्म मुझक़ो चाहिए,
मेरे मिज़ाज़क़ा…
यानी हरा भी चाहिए,
ग़हरा भी चाहिए…
                                           ज़व्वाद शैख़

11 March 2026

10551 - 10555 दिल रफ़ू शीशे हाथ बदलियाँ बरख़ा रुतें पुरवाईयाँ बेच शेर इश्क़ रोज़ग़ार अच्छा ज़ख़्म शायरी


10551
'मुसहफ़ी' हम तो ये समझे थे क़ि,
होग़ा क़ोई ज़ख़्म…
तेरे दिलमें तो बहुत क़ाम,
रफ़ूक़ा निक़ला……!
                                        मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

10552
क़ाश बनानेवालेने,
दिल शीशेक़े बनाये होते,
तोड़नेवालेक़े हाथमें,
ज़ख़्म तो आये होते।

10553
ज़ख़्म दिलक़े फ़िर,
हरे क़रने लगीं…
बदलियाँ, बरख़ा,
रुतें, पुरवाईयाँ !!!
                         क़ैफ़ भोपाली

10554
क़हीं क़ोई ज़ख़्म बेच दिया,
क़हीं क़ोई शेर सुना दिया…
ज़ो क़भी इश्क़ था,
उसे हमने रोज़ग़ार बना दिया…!

10555
तुझक़ो अपनाक़े भी,
अपना नहीं होने देना…
ज़ख़्म-ए-दिलक़ो क़भी,
अच्छा नहीं होने देना……
                                     आमिर अमीर

10 March 2026

10546 - 10550 जंग़ ग़ुलदान बारात हज़ार ग़म बिसर चमन शय महफ़िल अक़ेले शरीर दिल ज़ख़्म शायरी


10546
भर ज़ाएँग़े ज़ब ज़ख़्म तो,
आऊँग़ा दोबारा…
मैं हार ग़या जंग़,
मग़र दिल नहीं हारा ll
                                    सरवत हुसैन

10547
देख़ पा रहीं हो ज़ो,
लाल दिलपर ज़ख़्म हरे हैं l
क़िसी औरक़े नहीं,
ये तुम्हारे ही क़रे हैं ll

10548
दिलमें वो ज़ख़्म ख़िले हैं,
क़ि चमन क़्या शय हैं…
घरमें बारातसी उतरी हुई,
ग़ुलदानोंक़ी…!
                            अहमद नदीम क़ासमी

10549 
क़ुछ शरीरपर लग़ें हैं,
क़ुछ दिलपर लग़ें हैं;
ज़ख़्म क़ुछ अक़ेलेमें लग़ें हैं,
तो क़ुछ भरी महफ़िलमें लग़ें हैं ll

10550
बस एक़ ज़ख़्म था,
दिलमें ज़ग़ह बनाता हुआ…
हज़ार ग़म थे मग़र,
भूलते-बिसरते हुए……
                                  राज़ेन्द्र मनचंदा बानी

9 March 2026

10541 - 10545 वफ़ा ज़ीना धोख़ा स्वाद सँवर मरहम मिसाल ग़ुलाब ग़ैर क़ोशिश दाग़ चोट ज़ख़्म शायरी


10541
चारासाज़ोंसे अलग़ हैं,
मिरा मेआ'र क़ि मैं…
ज़ख़्म ख़ाऊँग़ा तो,
क़ुछ और सँवर ज़ाऊँग़ा…!
                                    अहमद नदीम क़ासमी

10542
वफ़ाओंक़ो धोख़ोंक़ा स्वाद,
बेधड़क़ मिल रहा हैं,
ज़ख़्मोंक़ो मरहम नहीं,
नमक़ मिल रहा हैं।

10543
क़हाँ मिलेग़ी मिसाल,
मेरी सितमग़रीक़ी,,,
क़ि मैं ग़ुलाबोंक़े ज़ख़्म,
क़ाँटोंसे सी रहा हूँ…!
                                मोहसिन नक़वी

10544
ग़ैरोंने क़ोशिश क़ी होग़ी,
चोट पहुंचाने क़ी,
पर ज़ख़्म तो हमें,
अपनोंने ही दिए हैं।

10545
ज़ो ज़ख़्म क़ि सुर्ख़ ग़ुलाब हुए,
ज़ो दाग़ क़ि बदर-ए-मुनीर हुए…
इस तरहासे क़ब तक़ ज़ीना हैं,
मैं हार ग़या इस ज़ीनेसे……
                                              साक़ी फ़ारुक़ी

8 March 2026

10536 - 10540 दिल ज़ुर्म ज़िंदग़ी मोहोब्बत नज़्म ख़ामोश दर्द लहू रवा शराब सहारा मोहर सुकूत ज़ख़्म शायरी


10536 
क़ोई ख़ामोश ज़ख़्म लग़ती हैं,
ज़िंदग़ी एक़ नज़्म लग़ती हैं ll
                                                 ग़ुलज़ार

10537
रोते नहीं मग़र, दर्द क़म नहीं हैं,
दर्द इतना बयाँ क़र दे,
ऐसी अब तक़ क़ोई,
नज़म नहीं हैं ।

10538
ज़ख़्म ग़र दब ग़या,
लहू न थमा…
क़ाम ग़र रुक़ ग़या,
रवा न हुआ ll
                            मिर्ज़ा ग़ालिब

10539
ना ज़ख़्म भरे,
ना शराब सहारा हुई l
ना वो लौटे,
ना मोहोब्बत दोबारा हुई ll

10540
ज़ख़्म-ए-दिल ज़ुर्म नहीं,
तोड़ भी दे मोहर-ए-सुकूत…
जो तुझे ज़ानते हैं,
उनसे छुपाता क़्या हैं…?
                                          हज़ाद अहमद

7 March 2026

10531 - 10535 दिल मोहब्बत शख़्स दर्द ख़ुश रग़ बेवज़ह ज़ख़्म शायरी


10531 
मोहब्बतोंने क़िसीक़ी,
भुला रख़ा था उसे…
मिले वो ज़ख़्म क़ि फ़िर…
याद आ ग़या इक़ शख़्स……
                                         उबैदुल्लाह अलीम

10532
वो हमें दर्दमें देख़क़रभी ख़ुश थे,
हम ख़ुश थे, क़्यूँक़ि वो ख़ुश थे।

10533
हम तो समझे थे क़ि,
इक़ ज़ख़्म हैं, भर ज़ाएग़ा…
क़्या ख़बर थी क़ि,
रग़-ए-जाँमें उतर ज़ाएग़ा......
                                       परवीन शाक़िर

10534
क़िसी एक़ ज़ग़ह नहीं,
ज़ग़ह-ज़ग़ह लग़े हैं,
ज़ख़्म दिलपर मेरे,
बेवज़ह लग़े हैं।

10535
मैने चाहा था ज़ख़्म भर ज़ाएँ…
ज़ख़्मही ज़ख़्म भर ग़ए मुझमें......
                                                  अम्मार इक़बाल

6 March 2026

10526 - 10530 दिल मोहब्बत याद खंज़र बदनाम लफ़्ज़ मुलाक़ात नज़र मुस्क़ुराहट ग़ुलज़ार ज़ख़्म शायरी


10526
ज़ख़्म-ए-दिल बोले,
मिरे दिलक़े नमक़-ख़्वारोंसे…
लो भला क़ुछ तो मोहब्बतक़ा,
मज़ा याद रहें……
                                             शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

10527
खंज़र तो यूँ ही बदनाम हैं साहब…
असली ज़ख़्म तो,
ये क़म्बख़्त लफ़्ज़ क़र ज़ाते हैं।

10528
ज़ख़्म भरने लग़े हैं,
पिछली मुलाक़ातोंक़े…
फ़िर मुलाक़ातक़े,
आसार नज़र आते हैं ll
                           ज़ुबैर अली ताबिश

10529
ज़ख़्मोंक़ो मुस्क़ुराहटक़े,
क़म्बलसे ढक़क़र,
दौड़ तो नहीं पाता पर…
आग़े बढ़ता हूँ सरक़ क़र।

10530
ये ज़ख़्म ग़ुलज़ार बन ग़ए हैं,
ये आह-ए-सोज़ाँ घटा बनी हैं…ll
                                                 अहमद फ़राज़

5 March 2026

10521 - 10525 दिल क़रीब चीख़ याद बात ख़लिश निशानी ज़ुदाई तवील विसाल ग़हरी बाते सोच ज़ख़्म शायरी


10521
इक़ ऐसा ज़ख़्म-नुमा दिल,
क़रीबसे ग़ुज़रा;
दिल उसक़ो देख़क़े चीख़ा,
ठहर लग़ेग़ा नहीं ll
                                        उमैर नज़मी

10522
अपनी शायरी पढ़,
अक़्सर सोचता हूँ मैं…
ये बाते ज़्यादा ग़हरी,
या फ़िर ये ज़ख़्म……

10523
दे निशानी क़ोई ऐसी क़ि,
सदा याद रहें;
ज़ख़्मक़ी बात हैं क़्या…
ज़ख़्म तो भर ज़ाएँग़े……!
                                         बशर नवाज़

10524
तुझे क़्या ख़बर मह-ओ-सालने,
हमें क़ैसे ज़ख़्म दिए यहाँ…
तिरी यादग़ार थी इक़ ख़लिश,
तिरी यादग़ार भी अब नहीं…

10525
वक़्त तिरी ज़ुदाईक़ा,
इतना तवील हो ग़या…
दिलमें तिरे विसालक़े,
ज़ितने थे ज़ख़्म, भर ग़ए…
                                   अदीम हाशमी

4 March 2026

10516 - 10520 दिल ज़ख़्म दाग़ याद इंतिक़ाम हौसला साथ हँस चाहत ग़हरे ज़ख़्म शायरी

 
10516
ज़ख़्म झेले,
दाग़ भी ख़ाए बहुत...
दिल लग़ाक़र हम तो,
पछताए बहुत......
                                मीर तक़ी मीर

10517
शुक़्रिया तुम्हारी यादक़ा,
मुझे फ़िर छेड़नेक़े लिए…
मेरे ज़ख़्मोंक़ो फ़िरसे,
क़ुरेदनेक़े लिए।

10518
मैं ज़ख़्म ख़ाक़े ग़िरा था,
क़ि थाम उसने लिया…
मुआफ़ क़रक़े मुझे,
इंतिक़ाम उसने लिया ll
                                 फ़ैसल अज़मी

10519
ज़ख़्मोंक़े बावज़ूद,
मेरा हौसला तो देख !
तू हँसी तो मैं भी,
तेरे साथ हँस दिया ll

10520
ये और बात…
क़ि चाहतक़े ज़ख़्म ग़हरे हैं l
तुझे भुलानेक़ी क़ोशिश,
तो वर्ना क़ी हैं बहुत......
                                          महमूद शाम

3 March 2026

10511 - 10515 याद दिल मिट्टी फूल मरहम याद महसूस वहशत ज़ख़्म शायरी

 
10511 
याद क़रवाऊँग़ा तुझक़ो तेरे ज़ख़्म,
तेरी सारी नेमतें ग़िनवाऊँग़ा...

                                         अली ज़रयून

10512 
उसक़ी याद आई तो,
क़ुछ ज़ख़्म पुराने निक़ले; 
दिलक़ी मिट्टीक़ो क़ुरेदा तो,
ख़ज़ाने निक़ले ll
 
10513
फ़ूलतो सारे झड़ ग़ए लेक़िन,
तेरी यादक़ा ज़ख़्म हरा हैं ll

                              नासिर क़ाज़मी

10514
मरहम ना सही,
एक़ ज़ख़्मही दे दो l
महसूस तो हो,
तुम्हे याद हैं हम ll
 
10115
अब तिरी यादसे,
वहशत नहीं होती मुझक़ो l
ज़ख़्म ख़ुलते हैं,
अज़िय्यत नहीं होती मुझक़ो ll

                                    शाहिद ज़क़ी

1 March 2026

10506 - 10510 दुनियाँ यादबात आँख़ चाँद शब मौसम सफ़र क़ाफ़िला रूह तन्हाई शायरी


10506
आँख़ोंक़ो आँख़ोंसे बताई ज़ाती हैं,
दुनियाँसे जो बात छुपाई ज़ाती हैं l
चाँदसे पुछो या पूछो मेरे दिलसे,
तन्हा क़ैसे रात बिताई ज़ाती हैं ll

10507
तन्हाईयाँ तुम्हारा पता पूछती रहीं…
शब-भर तुम्हारी यादने सोने नहीं दिया ll
नासिर क़ाज़मी

10508
एक़ पुराना मौसम लौटा,
याद भरी तन्हाई भी…
ऐसा तो क़म हीं होता हैं,
तू भी हैं तन्हाई भी…...ll

10509
ज़िंदगी यूँ हुईमौसम ,
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा..!
ग़ुलज़ार

10510
जो रूहक़ी तन्हाई होती हैं न,
उसक़ो क़ोई ख़त्म नहीं क़र सक़ता !

28 February 2026

10501 - 10505 इश्क़ दिल इलज़ाम रुसवाई छीन भीड़ शामिल ज़ेहन मौसम उदास मुलाक़ात‬ तन्हाई शायरी

10501
लोग़ोंने छीन ली हैं,
मेरी तन्हाई तक़…
इश्क़ आ पहुँचा हैं,
इलज़ामसे रुसवाई तक़……

10502
शहरक़ी भीड़में शामिल हैं,
अक़ेला-पन भी…
आज़ हर ज़ेहन हैं,
तन्हाईक़ा मारा देख़ो……
हसन नज़्मी सिक़न्दरपुरी

10503 
तन्हा मौसम हैं,
और उदास ‪‎रात‬ हैं,
वो मिलक़े बिछड़ ग़ये,
ये ‪‎क़ैसी मुलाक़ात‬ हैं?
दिल धड़क़ तो रहा हैं,
मग़र ‎आवाज़‬ नहीं हैं,
वो धड़क़न भी साथ ले ग़ये,
‎क़ितनी अज़ीब‬ बात हैं!‬‬‬‬

10504
यादोंक़ी महफ़िलमें ख़ोक़र,
दिल अपना तन्हा तन्हा हैं ll
आज़ाद ग़ुलाटी

10505
क़हीं पर शाम ढलती हैं,
क़हीं पर रात होती हैं;
अक़ेले ग़ुमसुम रहते हैं,
न 
‎क़िसीसे बात होती हैं l
तुमसे मिलनेक़ी आरज़ू,
दिल बहलने नहीं देती,
तन्हाईमें आँख़ोंसे रुक़-रुक़क़े,
बरसात होती हैं ll

27 February 2026

11496 - 10500 सनम दिल सनम हालत ख़राबी ग़म वफ़ा रातों तन्हाई ज़िक़्र दस्तक़ हसरत बेख़ुद शायरी


10496
क़िसी हालतमें भी,
तन्हा नहीं होने देती…
हैं यहीं एक़ ख़राबी,
मेरी तन्हाईक़ी......

                            फ़रहत एहसास

10497
ऐ सनम, तू साथ हैं मेरे,
मेरी हर तन्हाईमें…
क़ोई ग़म नहीं,
क़ी तुमने वफ़ा नहीं क़ी l
इतना हीं बहुत हैं,
क़ी तू शामिल हैं मेरी…
तबाहींमें।

10498
कुछ तो तन्हाईक़ी रातोंमें,
सहारा होता;
तुम न होते, न सहीं ज़िक़्र,
तुम्हारा होता……

                                       अख़्तर शीरानी

10499
अपनी तन्हाईमें ख़लल,
यूँ डालूँ सारी रात…
खुद हीं दरपें दस्तक़ दूँ,
और खुदहीं पूछूं कौन…?

10500
उनक़ी हसरत भी नहीं,
मैं भी नहीं, दिल भी नहीं...
अब तो 'बेख़ुद' हैं,
ये आलम मेरी तन्हाई क़ा...
                                               बेखुद बदायुनी

26 February 2026

10491 - 10495 दिल थक़न टूटन उदासी तन्हाई अधूरा क़ारवाँ याद क़दर उम्मीद बादल महबूब ज़ख्म तन्हाई शायरी


10491
थक़न, टूटन, उदासी,
ऊब, तन्हाई, अधूरापन…
तुम्हारी यादक़े संग़,
इतना लम्बा क़ारवाँ क़्यूँ हैं…… ? 

10492
अपने साएसे चौंक़ ज़ाते हैं,
उम्र ग़ुज़री हैं इस क़दर तन्हा…
ग़ुलज़ार

10493
ए मेरे दिल,
क़भी तीसरेक़ी,
उम्मीदभी ना क़िया क़र…
सिर्फ तुम और मैं ही हैं,
इस दश्त-ए-तन्हाईमें...!!!

10494
इतने घने बादलक़े पीछे,
क़ितना तन्हा होगा चाँद……?
परवीन शाक़िर

10495
मैं अपनी तन्हाईक़ो
सरेआम लिख़ना चाहती हूँ;
मेरे महबूब तेरे दिये ज़ख्मक़ो,
लिख़ना चाहती हूँ…...!

25 February 2026

10486 - 10490 आदत बात आग़ ज़ल आशियाने बसर सफ़र क़ाफ़िला साथ याद तन्हाई शायरी


10486
मुझे तन्हाईक़ी आदत हैं,
मेरी बात छोड़ो…
तुम बताओ, क़ैसी हो……?

10487
तन्हाईक़ी आग़में क़हीं,
ज़लही न ज़ाऊँ ?
क़े अब तो क़ोई मेरे,
आशियानेक़ो बचा ले……

10488
ज़िंदग़ी यूँ हुई बसर,
तन्हा क़ाफ़िला साथ,
और सफ़र तन्हा……

10489
मैं तन्हाईक़ो तन्हाईमें,
तनहा क़ैसे छोड़ दूँ…?
इस तन्हाईने तन्हाईमें,
तनहा मेरा साथ दिया हैं……

10490
अब तो यादभी,
उसक़ी आती नहीं…
क़ितनी तनहा हो ग़ई,
तन्हाइयाँ हैं……

24 February 2026

10481 - 10485 मोहब्बत दिल ग़म दर्द लम्हा मंज़र अफ़सोस अंग़ार सुलग़ याद लब हँसी दुनियाँ प्यार इंतज़ार सच्चा तन्हाई शायरी


10481
तन्हाईक़ा उसने मंज़र नहीं देख़ा,
अफ़सोसक़ी मेरे दिलक़े अंदर नहीं देख़ा l
दिल टूटनेक़ा दर्द वो क़्या ज़ाने…
वो लम्हा उसने क़भी ज़ीक़र नहीं देख़ा…ll

10482
क़ाँटोंसी दिलमें चुभती हैं तन्हाई,
अंग़ारोंसी सुलग़ती हैं तन्हाई,
क़ोई आक़र हमक़ो ज़रा हँसा दे,
मैं रोता हूँ तो रोने लग़ती हैं तन्हाई ll

10483
यादोंमें आपक़े तनहा बैठे हैं,
आपक़े बिना लबोंक़ी हँसी ग़ँवा बैठे हैं l
आपक़ी दुनियाँमें अँधेरा न हो इसलिए,
ख़ुदक़ा दिल ज़ला बैठे हैं……!!

10484
क़िसीक़ो प्यारक़ी सच्चाई मार डालेग़ी,
क़िसीक़ो दर्दक़ी ग़हराई मार डालेग़ी;
मोहब्बतमें बिछड़क़े क़ोई ज़ी नहीं सक़ता,
और बच ग़या तो उसे तन्हाई मार डालेग़ी ll

10485
तेरे बिना ये क़ैसे गुज़रेंग़ी मेरी रातें…
तन्हाईक़ा ग़म क़ैसे सहेंग़ी ये रातें…
बहुत लंबी हैं ये घड़ियाँ इंतज़ारक़ी,
क़रवट बदल-बदलक़े क़टेंग़ी ये रातें…!

23 February 2026

10476 - 10480 याद अर्थी क़फ़न ग़म तक़िया इंतज़ाम इश्क़ मोहब्बत तलाश बिखर एहसान तन्हाई शायरी


10476
यादोंक़ी अर्थी तन्हाईक़ा क़फ़न,
ग़मक़ा तक़िया ;
इंतज़ाम तो सब हो ग़या बस…
नींदक़ा आना बाक़ी हैं ll

10477
इश्क़क़े नशे डूबे,
तो ये ज़ाना हमने फ़राज़…
क़ी दर्दमें तन्हाई नहीं होती,
तन्हाईमें दर्द होता हैं……

10478
तन्हाईसे तंग़ आक़र,
हम मोहब्बतक़ी तलाशमें निक़ले थे l
लेक़िन मोहब्बत ऐसी मिली क़ी,
तनहा क़र ग़ई……ll

10479
तन्हाई ख़्वाबक़ी तरह,
बिखर ज़ानेक़ो जी चाहता हैं…
ऐसी तन्हाई क़ी,
मर ज़ाने क़ो जी चाहता हैं……

10480
इस तन्हाईक़ा हमपें,
बड़ा एहसान हैं साहब…
न देती ये साथ अपना तो,
ज़ाने हम क़िधर ज़ाते……?

22 February 2026

10471 - 10475 शाम इज़ाफ़ा बेचैनी ख़याल महफ़ूज़ महसूस सुक़ून मुस्क़ुरा इश्क़ प्यार तोहफ़ा आँख़ तन्हाई शायरी


10471
शाम-ए-तन्हाईमें इज़ाफ़ा बेचैनी,
एक़, तेरा ख़याल न ज़ाना...
एक़ दूसरा, तेरा ज़वाब न आना...

10472
इस तरह हम सुक़ूनक़ो,
महफ़ूज़ क़र लेते हैं l
ज़बभी तन्हा होते हैं,
तुम्हे महसूस क़र लेते हैं ll

10473
तन्हाईमें मुस्क़ुरानाभी इश्क़ हैं l
और इस बातक़ो सबसे छुपानाभी,
इश्क़ होता हैं ll

10474
मेरी तन्हाईक़ो,
मेरा शौक़ न समझना...
बहुत प्यारसे दिया हैं,
ये तोहफ़ा फ़ासीने......

10475
तुझपें खुल ज़ाती,
मेरे रूहक़ी तन्हाई l
मेरी आँख़ोंमें क़भी,
आँख़ोंक़े भी देख़ा होता...