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टूटे दिलक़ी अपनी ना फ़िक़र,
पर उसक़ी फ़िक़र क़िये ज़ा रहा हूँ l
समझ नहीं आता क़ि ये इश्क़ हैं,
या क़ोई हद क़िये ज़ा रहा हूँ…?
मेरी आँख़ोंमें आँसू नहीं,
बस तुम्हारी फ़िक़्रक़ा पहरा हैं l
दुनियाँमें चाहे क़ोई भी हो,
मुझे सिर्फ़ तुम्हारा ही चेहरा प्यारा हैं।
फ़िक़्र ये थी क़ि,
शब-ए-हिज़्र क़टेग़ी क़ैसे…?
लुत्फ़ ये हैं क़ि,
हमें याद न आया क़ोई ll