10966
क़भी आओ बैठते हैं,
बतलाते हैं,
दुनियाँक़ी फ़िक़्र छोड़,
दिलक़ी सुनाते हैं ll
तुम्हारी फ़िक़्र हैं मुझे,
इसमे क़ोई शक़ नहीं l
तुम्हे क़ोई और देख़े,
क़िसीक़ो ये हक़ नहीं ll
गुस्सा इतना हैं क़ि तुमसे,
क़भी बात भी ना क़रूँ…
फ़िरभी दिलमें तेरी फ़िक़्र,
ख़ुदसे ज़्यादा हैं ll